Thu, 08 Oct 20265:04 PM
Thu, Oct 8, 2026Updated 5:04 PM IST
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किशनगंज: केस डायरी समय पर पेश न करने पर बहादुरगंज थानाध्यक्ष का वेतन रोकने की अनुशंसा, अपर सत्र न्यायाधीश ने SP को लिखा पत्र

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किशनगंज। बिहार के किशनगंज व्यवहार न्यायालय ने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली में लापरवाही को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने बहादुरगंज थानाध्यक्ष सुनील कुमार के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उनका वेतन रोकने की सिफारिश की है। यह कठोर कदम संबंधित मामले में केस डायरी (Case Diary) निर्धारित समय सीमा के भीतर न्यायालय में पेश न करने की वजह से उठाया गया है। अपर सत्र न्यायाधीश प्रथम सुरेश कुमार की अदालत ने इस बाबत किशनगंज के पुलिस अधीक्षक (SP) को एक औपचारिक पत्र लिखकर थानाध्यक्ष के विरुद्ध आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। साथ ही, इस लापरवाही के चलते संबंधित मामले में अग्रिम जमानत याचिका पर होने वाली सुनवाई को भी स्थगित कर दिया गया है।

न्यायालय द्वारा उठाए गए इस कदम को आपराधिक न्याय प्रणाली में पुलिस की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण विकास माना जा रहा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, बहादुरगंज थाना क्षेत्र से जुड़े एक संवेदनशील मामले में अभियुक्त की ओर से दाखिल अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई प्रस्तावित थी। अग्रिम जमानत की सुनवाई के लिए यह अनिवार्य होता है कि जांच अधिकारी या थानाध्यक्ष द्वारा मामले की पूरी केस डायरी और स्थिति रिपोर्ट (Status Report) समय पर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाए। ताकि न्यायाधीश यह आकलन कर सकें कि क्या आरोपी की गिरफ्तारी की आवश्यकता है या उसे अग्रिम जमानत का लाभ दिया जाना चाहिए। हालांकि, बहादुरगंज थानाध्यक्ष सुनील कुमार द्वारा बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद केस डायरी न्यायालय में पेश नहीं की गई।

अपर सत्र न्यायाधीश सुरेश कुमार ने इस देरी को न केवल न्यायिक प्रक्रिया में बाधा माना, बल्कि इसे न्यायालय की अवमानना और कर्तव्यों में घोर लापरवाही भी करार दिया। न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि पुलिस पदाधिकारियों का यह दायित्व है कि वे न्यायालय के आदेशों का अनुपालन समयबद्ध तरीके से करें। जब पुलिस रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराती है, तो न्याय वितरण की प्रक्रिया बाधित होती है और वादी तथा प्रतिवादी दोनों पक्षों को अनावश्यक मानसिक और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसी संदर्भ में, न्यायालय ने थानाध्यक्ष के वेतन भुगतान पर रोक लगाने की अनुशंसा पुलिस अधीक्षक से की है, ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही दोहराई न जाए।

केस डायरी की अनुपस्थिति के कारण अग्रिम जमानत की सुनवाई टलने का सीधा असर वादकारियों पर पड़ा है। जहां एक ओर अभियुक्त को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत मिलने में विलंब हो रहा है, वहीं दूसरी ओर न्यायालय का बहुमूल्य समय भी व्यर्थ हो रहा है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के प्रावधानों के तहत, केस डायरी जांच का एक अभिन्न अंग है और इसके बिना किसी भी आपराधिक मामले में न्यायिक निगरानी संभव नहीं है। किशनगंज न्यायालय का यह आदेश इस बात का संकेत है कि अब अदालतें पुलिस की कार्यशैली में सुधार लाने के लिए प्रशासनिक और वित्तीय दोनों तरह के दंडात्मक उपाय करने को तैयार हैं।

पुलिस अधीक्षक को लिखे गए पत्र में न्यायालय ने यह भी अपेक्षा जताई है कि थानाध्यक्ष के खिलाफ की गई कार्रवाई की रिपोर्ट नियत समय पर न्यायालय को सौंपी जाए। यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि न्यायालय की टिप्पणियों या मौखिक आदेशों का पालन निचले स्तर पर ठीक से नहीं होता, लेकिन जब लिखित रूप में वेतन रोकने जैसे वित्तीय दंड की बात आती है, तो प्रशासनिक तंत्र में हलचल तेज हो जाती है। बहादुरगंज थानाध्यक्ष सुनील कुमार का मामला अन्य पुलिस पदाधिकारियों के लिए भी एक नजीर बन सकता है, जिससे वे भविष्य में न्यायालयीन आदेशों के अनुपालन में अधिक सतर्कता बरतें।

उल्लेखनीय है कि बिहार में पिछले कुछ वर्षों में न्यायालयों द्वारा पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने और कार्रवाई की सिफारिश करने के मामले बढ़े हैं। केस डायरी में हेराफेरी, सबूतों की गुमशुदगी या फाइलों को समय पर पेश न करना आम समस्याएं रही हैं। ऐसे में किशनगंज की अपर सत्र न्यायालय की यह पहल न्यायिक सक्रियता का उदाहरण है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि पुलिस अधीक्षक स्तर पर इस अनुशंसा पर अंतिम कार्रवाई कब तक पूरी होगी और क्या थानाध्यक्ष को अपनी सफाई पेश करने का अवसर दिया जाएगा। फिलहाल, न्यायालय का आदेश प्रभावी है और अग्रिम जमानत याचिका पर अगली सुनवाई की तिथि घोषित होने तक मामला लंबित रहेगा। न्यायिक सूत्रों का कहना है कि यदि अगली तारीख पर भी केस डायरी पेश नहीं की गई, तो न्यायालय और भी कठोर वैधानिक कार्रवाई करने को बाध्य हो सकता है।