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Tue, Oct 13, 2026Updated 7:52 AM IST
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किशनगंज: नाबालिग से छेड़छाड़ और कपड़े फाड़ने के मामले में पॉक्सो कोर्ट ने सुनाया फैसला, दोषी को 4 साल की सजा और 10 हजार रुपये का जुर्माना

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किशनगंज। बिहार के किशनगंज जिले में नाबालिग लड़की से छेड़छाड़ और उसके कपड़े फाड़ने के गंभीर मामले में विशेष पॉक्सो (POCSO) अदालत ने एक बड़ा और सख्त फैसला सुनाया है। किशनगंज की विशेष पॉक्सो अदालत ने इस मामले में आरोपी को दोषी करार देते हुए चार साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही अदालत ने दोषी पर दस हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। यह फैसला सोमवार को न्यायाधीश सुरेश कुमार सिंह की अदालत ने सुनाया। वंदे भारत न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला बाल यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो एक्ट) के तहत दर्ज किया गया था और अदालत ने त्वरित सुनवाई करते हुए पीड़िता को न्याय दिलाने का कार्य किया है।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक, यह पूरा मामला किशनगंज जिले का है, जहां एक नाबालिग लड़की के साथ छेड़छाड़ की गई थी। आरोपी ने नाबालिग के साथ न केवल अभद्र व्यवहार किया, बल्कि उसके कपड़े भी फाड़ दिए थे। इस घटना के बाद पीड़िता के परिजनों ने तत्काल स्थानीय थाने में जाकर प्राथमिकी दर्ज कराई थी। पुलिस ने शिकायत मिलते ही त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार किया और पॉक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया। इसके बाद पुलिस ने अपनी जांच पूरी कर अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया था।

सोमवार को इस मामले में किशनगंज की विशेष पॉक्सो अदालत में सुनवाई हुई। न्यायाधीश सुरेश कुमार सिंह की अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने और साक्ष्यों के गहन परीक्षण के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को संतोषजनक पाया। इसके आधार पर न्यायाधीश सुरेश कुमार सिंह ने आरोपी को पॉक्सो अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत दोषी करार दिया। दोषी ठहराए जाने के बाद अदालत ने उसे चार वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। सश्रम कारावास का अर्थ है कि दोषी को जेल में रहते हुए कठोर शारीरिक श्रम भी करना होगा।

अदालत ने सश्रम कारावास की सजा के अतिरिक्त दोषी पर दस हजार रुपये का आर्थिक जुर्माना भी लगाया है। अदालत द्वारा लगाए गए इस जुर्माने की राशि का भुगतान नहीं करने की स्थिति में दोषी को अतिरिक्त समय तक जेल में रहना पड़ सकता है, जो कि ऐसे मामलों में सामान्य कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा होता है। यह सजा और जुर्माना दोनों ही अपराध की गंभीरता को देखते हुए तय किए गए हैं।

बता दें कि बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों को रोकने और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2012 में बाल यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (Protection of Children from Sexual Offences Act – POCSO) लागू किया गया था। इस कानून के तहत 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे या बच्ची के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़ और अन्य अपराधों को बेहद गंभीर माना जाता है। पॉक्सो कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लिंग-तटस्थ (gender-neutral) है और इसमें पीड़ित बच्चे की पहचान गुप्त रखने के सख्त नियम हैं। इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर कठोर सजा का प्रावधान है, ताकि समाज में ऐसे अपराधों के प्रति भय बना रहे और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

किशनगंज जिले में पॉक्सो अदालत द्वारा सुनाया गया यह फैसला बच्चों की सुरक्षा और महिला सम्मान के लिहाज से एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अक्सर देखा जाता है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में नाबालिगों के साथ होने वाली ऐसी घटनाओं में पीड़ित पक्ष दबाव में आकर समझौता कर लेता है या फिर मामले को दबा दिया जाता है। लेकिन इस मामले में पीड़िता के परिजनों ने हिम्मत दिखाई और कानूनी लड़ाई लड़ी, जिसका परिणाम अब अदालत के फैसले के रूप में सामने आया है।

स्थानीय स्तर पर इस फैसले की काफी सराहना हो रही है। लोगों का मानना है कि न्यायाधीश सुरेश कुमार सिंह की अदालत द्वारा दी गई यह सजा समाज में एक मजबूत संदेश देगी। ऐसे अपराधियों के मन में कानून का डर बैठेगा और वे भविष्य में किसी भी नाबालिग के साथ ऐसा कुकृत्य करने से पहले कई बार सोचेंगे। किशनगंज पुलिस की भूमिका भी इस मामले में महत्वपूर्ण रही, क्योंकि उन्होंने समय रहते जांच पूरी कर अदालत में मजबूती से पक्ष रखा, जिससे दोषी को सजा दिलाने में मदद मिली।

वंदे भारत न्यूज़ के संवाददाता की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत का यह फैसला उन सभी लोगों के लिए एक चेतावनी है जो बच्चों और नाबालिगों के साथ किसी भी प्रकार का अपराध करने की सोचते हैं। पॉक्सो अदालतें देश भर में बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए निरंतर काम कर रही हैं और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की दिशा में प्रतिबद्ध हैं। किशनगंज का यह ताजा मामला इसी कड़ी का एक हिस्सा है, जिसमें न्यायपालिका ने पीड़िता को न्याय दिलाकर कानून के शासन को मजबूत किया है। फिलहाल, सजा सुनाए जाने के बाद दोषी को जेल भेज दिया गया है, जहां वह अपनी चार साल की सजा पूरी करेगा।