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किशनगंज सांसद डॉ. मोहम्मद जावेद आजाद ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र, उर्दू-बंगला TET शिक्षकों की सेवा बहाली की मांग

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किशनगंज। वंदे भारत न्यूज़। बिहार के किशनगंज लोकसभा क्षेत्र से सांसद डॉ. मोहम्मद जावेद आजाद ने राज्य में उर्दू और बंगला भाषा के शिक्षकों की सेवा समाप्ति के मामले को गंभीरता से उठाया है। उन्होंने इस संबंध में बिहार के मुख्यमंत्री को एक विस्तृत पत्र लिखकर उर्दू-बंगला टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) उत्तीर्ण शिक्षकों की सेवा बहाल करने की मांग की है। सांसद ने अपने पत्र में शिक्षकों की सेवा समाप्ति के जारी आदेश पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है। साथ ही उन्होंने यह भी अनुरोध किया है कि पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा कराई जाए, ताकि प्रभावित शिक्षकों को उचित न्याय मिल सके।

सांसद डॉ. मोहम्मद जावेद आजाद ने मुख्यमंत्री को संबोधित अपने पत्र में स्पष्ट रूप से कहा है कि उर्दू और बंगला भाषा के जो शिक्षक टीईटी उत्तीर्ण हैं, उनकी सेवाएं समाप्त किए जाने का आदेश दिया गया है। यह निर्णय उन शिक्षकों के भविष्य और उनके परिवारों की आजीविका पर सीधा और गहरा प्रभाव डाल रहा है। उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि वे व्यक्तिगत रूप से इस मामले में हस्तक्षेप करें और सेवा समाप्ति के आदेश पर तत्काल पुनर्विचार करने की दिशा में आवश्यक कदम उठाएं। सांसद ने पत्र में इस बात पर विशेष बल दिया है कि इन शिक्षकों ने टीईटी परीक्षा उत्तीर्ण कर अपनी शैक्षणिक योग्यता और पात्रता सिद्ध की है, ऐसे में उनकी सेवाओं को समाप्त करना उचित नहीं ठहराया जा सकता।

डॉ. मोहम्मद जावेद आजाद ने अपने पत्र में मामले की निष्पक्ष समीक्षा कराए जाने की मांग को भी प्रमुखता से रखा है। उनका कहना है कि यदि इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से समीक्षा की जाएगी, तो स्थिति की वास्तविकता सामने आ सकेगी। इसके माध्यम से यह स्पष्ट हो सकेगा कि जिन शिक्षकों की सेवाएं समाप्त की गई हैं, क्या वे नियमानुसार कार्य कर रहे थे और क्या उनकी सेवा समाप्ति का आदेश सभी शैक्षणिक और प्रशासनिक मानदंडों के अनुरूप है। सांसद ने यह भी रेखांकित किया है कि निष्पक्ष समीक्षा से प्रभावित शिक्षकों का मनोबल बढ़ेगा और उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद जगेगी।

किशनगंज लोकसभा क्षेत्र की भौगोलिक और जनसांख्यिकीय स्थिति को देखते हुए उर्दू और बंगला भाषा के शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह क्षेत्र पश्चिम बंगाल और नेपाल की सीमा से लगा हुआ है। यहां की एक बड़ी आबादी उर्दू और बंगला भाषा बोलती, पढ़ती और समझती है। ऐसे में स्थानीय स्कूलों में इन दोनों भाषाओं के शिक्षकों की उपस्थिति छात्रों की बुनियादी शिक्षा और उनके सर्वांगीण विकास के लिए अपरिहार्य है। जब इन भाषाओं के योग्य शिक्षकों की सेवाएं समाप्त कर दी जाती हैं, तो इसका सीधा असर क्षेत्र के विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ता है। छात्रों को अपनी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा प्राप्त करने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

उल्लेखनीय है कि बिहार में शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी टीईटी का आयोजन शिक्षकों की गुणवत्ता और पात्रता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया जाता है। जो अभ्यर्थी इस परीक्षा को उत्तीर्ण करते हैं, उन्हें सरकारी स्कूलों में शिक्षण कार्य के लिए योग्य माना जाता है। उर्दू और बंगला भाषा के शिक्षकों ने भी इस कठिन परीक्षा को पास कर अपनी पात्रता साबित की थी। सांसद डॉ. मोहम्मद जावेद आजाद ने अपने पत्र में इस तथ्य का उल्लेख करते हुए कहा है कि टीईटी उत्तीर्ण शिक्षकों को सेवा से हटाना न केवल उनकी मेहनत और योग्यता का अनादर है, बल्कि यह राज्य की शिक्षा व्यवस्था के लिए भी लाभदायक नहीं है।

शिक्षकों की सेवा समाप्ति के आदेश के बाद से किशनगंज और आसपास के इलाकों में चिंता का माहौल बना हुआ है। प्रभावित शिक्षक और उनके परिजन लगातार इस मामले में उचित कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। सांसद द्वारा मुख्यमंत्री को पत्र लिखे जाने के बाद अब स्थानीय स्तर पर यह उम्मीद जगी है कि राज्य सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर ध्यान देगी। शिक्षक संगठनों और स्थानीय लोगों ने सांसद डॉ. मोहम्मद जावेद आजाद के इस कदम का स्वागत किया है और इसे प्रभावित शिक्षकों के हित में उठाया गया एक जरूरी कदम बताया है।

अब सभी की निगाहें बिहार के मुख्यमंत्री कार्यालय और राज्य के शिक्षा विभाग की प्रतिक्रिया पर टिकी हुई हैं। यह देखा जाना बाकी है कि मुख्यमंत्री इस पत्र पर क्या संज्ञान लेते हैं और क्या शिक्षा विभाग को इस मामले की जांच या पुनर्विचार के निर्देश दिए जाते हैं। यदि सरकार द्वारा सेवा समाप्ति के आदेश पर पुनर्विचार किया जाता है और निष्पक्ष समीक्षा के बाद शिक्षकों की सेवाएं बहाल होती हैं, तो इससे न केवल किशनगंज बल्कि राज्य के अन्य हिस्सों में भी उर्दू और बंगला माध्यम के स्कूलों में शिक्षण कार्य सुचारू रूप से चल सकेगा। फिलहाल, सांसद के पत्र ने इस मुद्दे को एक बार फिर से प्रशासनिक और राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।