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2 घंटे पहले
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सवाल- मैं 38 साल का हूं और पिछले 10 साल से एक प्राइवेट कंपनी में काम कर रहा हूं। पिछले एक साल से कंपनी में लगातार ले–ऑफ हो रहे हैं, जिससे मेरे मन में हमेशा यह डर बना रहता है कि कहीं मेरी नौकरी भी न चली जाए।
हालांकि अभी तक मेरे परफॉर्मेंस को लेकर कोई नकारात्मक फीडबैक नहीं मिला है, लेकिन फिर भी मैं हर समय असुरक्षित महसूस करता हूं। ऑफिस में जब भी कोई मीटिंग होती है या बॉस अचानक बुलाते हैं, तो दिल की धड़कन तेज हो जाती है, नेगेटिव विचार आने लगते हैं। इस टेंशन में मैं चिड़चिड़ा हो गया हूं, परिवार के साथ रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं। मैं क्या करूं?
एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।
लगातार ले-ऑफ (छंटनी) के माहौल में काम करना सिर्फ प्रोफेशनल चैलेंज नहीं, बल्कि इमोशनल चैलेंज भी है। जब ऑफिस में बार-बार लोगों की नौकरी जाती दिखे, तो मन का एलर्ट मोड में रहना स्वाभाविक है। कई बार लोग बाहर से सामान्य दिखते हैं, लेकिन भीतर लगातार डर, असुरक्षा से लड़ रहे होते हैं।
समस्या तब और बढ़ जाती है, जब व्यक्ति अपने ही डर को ‘ओवररिएक्शन’ कहकर डिसमिस करने लगता है। यानी एंग्जाइटी के साथ सेल्फ क्रिटिसिज्म भी जुड़ जाता है। यही वह स्थिति है, जहां छंटनी का डर धीरे-धीरे मेंटल एग्जॉशन और सेल्फ-गैसलाइटिंग का रूप लेने लगता है। ऐसे में यह समझना बहुत जरूरी है कि हर डर गलत नहीं होता, लेकिन हर डर सच भी नहीं होता।

एंग्जाइटी नेचुरल रिस्पांस है
कंपनी में लगातार छंटनी होना किसी भी कर्मचारी के लिए तनाव, असुरक्षा और अपने भविष्य को लेकर डर का कारण बन सकता है। इसलिए यह सोचना कि “कहीं अगला मैं न होऊं” अपने आप में अबनॉर्मल नहीं है. एंग्जाइटी अक्सर भविष्य के खतरे को पहले से महसूस कराने लगती है. इसके कॉमन संकेत नीचे ग्राफिक में देखिए–

इस स्थिति में जो डर महसूस हो रहा है, वह पूरी तरह असामान्य नहीं है। जब किसी कंपनी में लगातार कर्मचारियों की छंटनी हो रही हो, तो मन का सतर्क हो जाना स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। यह डर किसी कल्पना से नहीं, बल्कि आसपास दिख रही अनिश्चितता से जुड़ा होता है। हां, कई बार मन खतरे की आशंका को वास्तविकता से थोड़ा बड़ा मानने लगता है।
मान लीजिए, बॉस ने अचानक मीटिंग के लिए बुलाया। उसी क्षण दिल की धड़कन तेज हो गई और मन में विचार आया— “कहीं अब मेरी नौकरी पर तो खतरा नहीं?” यह घबराहट इस बात का संकेत है कि दिमाग हर अनिश्चित परिस्थिति को संभावित खतरे की तरह पढ़ने लगा है। इसका मतलब यह नहीं कि जो आशंका मन में आ रही है, वह सच ही हो। बल्कि यह केवल शरीर और मन की तनावपूर्ण माहौल के प्रति संवेदनशील प्रतिक्रिया है।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, चिंता अक्सर उन बातों से जुड़ी होती है जो भविष्य में हो सकती हैं। वहीं, व्यवहार और सोच पर आधारित मनोचिकित्सीय पद्धतियां यह समझने में मदद करती हैं कि किसी घटना के बाद हमारे विचार, भावनाएं और व्यवहार एक-दूसरे को कैसे प्रभावित करते हैं।
सेल्फ-गैसलाइटिंग
लेकिन ‘सेल्फ-गैसलाइटिंग’ इससे अलग स्थिति है। इसमें व्यक्ति अपने डर को समझने या संभालने की कोशिश करने के बजाय खुद को ही गलत ठहराने लगता है। वह मन ही मन सोचता है— – “अभी तक मुझे निकाला तो नहीं गया, फिर मैं इतना क्यों डर रहा हूं?” – “मैं बेवजह बात को बढ़ा रहा हूं।” – “समस्या मेरे स्वभाव में ही है।”
यानी शुरुआत में समस्या केवल चिंता थी, लेकिन धीरे-धीरे व्यक्ति अपनी ही भावनाओं और अनुभवों को नकारने लगता है। यही स्थिति ‘सेल्फ-गैसलाइटिंग’ कहलाती है। यह कोई आधिकारिक मानसिक बीमारी नहीं, बल्कि ऐसा व्यवहार है, जिसमें इंसान अपनी भावनाओं को महत्वहीन या गलत मानने लगता है।

इसे एक सरल उदाहरण से समझिए— अगर बॉस अचानक मीटिंग के लिए बुलाएं और मन में तुरंत यह डर आए कि “कहीं अब मेरी नौकरी पर खतरा तो नहीं,” तो यह सामान्य चिंता है। लगातार छंटनी देखने के बाद ऐसा डर लगना स्वाभाविक है। लेकिन जब व्यक्ति उस डर के लिए खुद को कोसने लगे— “मैं कितना बेवकूफ हूं, मुझे ऐसा महसूस नहीं करना चाहिए,” तब वह अपनी ही भावनाओं को ही गलत साबित करने लगता है।
दोनों स्थितियों के बीच सबसे बड़ा अंतर ये है कि–
चिंता कहती है— “शायद कुछ गलत हो सकता है।” सेल्फ-गैसलाइटिंग कहती है— “तुम गलत हो कि तुम्हें ऐसे डर लग रहा है।”
पहली स्थिति में केवल डर होता है, लेकिन दूसरी स्थिति में डर के साथ अपराधबोध और शर्म भी जुड़ जाती है।
क्या आप खुद को गैसलाइट कर रहे हैं? करें सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट
यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 12 सवाल हैं। आपको इन सवालों को 0 से 3 के स्केल पर रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल के लिए अगर आपका जवाब ‘कभी नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘लगभग हमेशा’ है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें।

इस एसेसमेंट टेस्ट के बाद खुद से ये दो सवाल और पूछें—
- क्या मैं अपने डर को समझने की कोशिश कर रहा हूं, या उस डर के लिए खुद को ही दोष दे रहा हूं?
- क्या मैं यह स्वीकार कर पा रहा हूं कि “मेरा डर स्वाभाविक है, लेकिन केवल डर महसूस होना इस बात का प्रमाण नहीं कि कोई बुरी घटना निश्चित रूप से होने वाली है?”
अगर इस तरह के सवालों में आपका स्कोर ज्यादा आता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप कमजोर व्यक्ति हैं। यह केवल इस बात का संकेत है कि चिंता के साथ-साथ खुद की आलोचना करने की आदत भी बढ़ रही है।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी तनावपूर्ण स्थिति में यह समझना जरूरी होता है कि कौन-सी बात तनाव को शुरू करती है। उसके बाद मन में कौन-से विचार आते हैं, उनसे कैसी भावनाएं पैदा होती हैं और फिर हमारा व्यवहार कैसे बदलता है। इसी समझ के आधार पर कई मनोवैज्ञानिक पद्धतियां व्यक्ति को अपने डर और नकारात्मक सोच को संभालना सिखाती हैं।
चार हफ्तों का CBT आधारित सेल्फ हेल्प प्लान
सप्ताह 1
अपने तनाव के पैटर्न को पहचानना
हर दिन एक या दो बार कुछ मिनट निकालकर अपनी स्थिति पर छोटे नोट्स लिखें। इसमें इन बातों को शामिल करें—
- स्थिति क्या थी।
- उस समय मेरे मन में क्या विचार आया।
- उस वक्त कैसा महसूस हुई, क्या भावना थी।
- शरीर में क्या बदलाव महसूस हुए।
- आपने कैसा व्यवहार किया और खुद से क्या कहा।
उदाहरण के तौर पर—
स्थिति: बॉस ने अचानक बुलाया।
विचार: “शायद मेरी नौकरी चली जाए।”
भावना: बहुत ज्यादा डर महसूस होना
शारीरिक प्रतिक्रिया: दिल की धड़कन तेज होना, पेट में घबराहट।
व्यवहार: चुप हो जाना, घर पर चिड़चिड़ापन।
खुद से कही बात: “मैं शायद बात को जरूरत से ज्यादा बढ़ा रहा हूं।”
- इस अभ्यास का उद्देश्य अपने डर से लड़ना नहीं, बल्कि उसे पहचानना और समझना है।
- जब व्यक्ति अपने तनाव के संकेतों को समझने लगता है, तो वह यह भी पहचान पाता है कि किन परिस्थितियों में उसका मन और शरीर सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
- मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ तनाव के दौरान शरीर के संकेतों पर ध्यान देने और गहरी, धीमी सांस लेने को कहते हैं।
- साथ ही वे खुद को शांत करने वाले छोटे अभ्यास अपनाने की सलाह देते हैं।
सप्ताह 2
तथ्य और आशंका में फर्क समझना
जब भी मन में अचानक डर या घबराहट बढ़े, उस समय खुद से ये तीन सवाल पूछिए—
- इस समय वास्तविक तथ्य क्या है?
- मैं अपनी तरफ से कौन-सा अनुमान जोड़ रहा हूं?
- स्थिति को देखने का सबसे संतुलित तरीका क्या हो सकता है?
उदाहरण के लिए—
तथ्य: एक मीटिंग बुलाई गई है।
अनुमान: शायद यह नौकरी खत्म करने से जुड़ी मीटिंग है।
संतुलित सोच: कंपनी में छंटनी हुई है, इसलिए डर लगना स्वाभाविक है। लेकिन अभी तक मेरे काम को लेकर कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है।
- यह अभ्यास मन को हर परिस्थिति का सबसे बुरा परिणाम मान लेने की आदत से बाहर निकालने में मदद करता है।
- कई बार तनाव में व्यक्ति बिना किसी ठोस सबूत के नकारात्मक निष्कर्ष निकाल लेता है।
- साइकोलॉजिकल मेथड ऐसे ही नेगेटिव पैटर्न को पहचानने और उन्हें बैलेंस्ड करने पर जोर देते हैं।

सप्ताह 3
खुद को गलत ठहराने की आदत को चुनौती देना
जब मन यह कहे—
- “मुझे ऐसा महसूस नहीं करना चाहिए”
- “मैं बेवजह डर रहा हूं”
तो खुद को डांटने के बजाय कुछ संतुलित और मददगार बातें याद दिलाइए। जैसे—
- “इस परिस्थिति में मेरा डर स्वाभाविक है।”
- “घबराहट केवल एक संकेत है, अंतिम सच्चाई नहीं है।”
- “मैं अपने डर को पूरी तरह सच माने बिना स्वीकार कर सकता हूं।”
- “अनिश्चितता असहज जरूर होती है, लेकिन हर बार खतरे का संकेत नहीं होती।”
इन बातों को हर दिन कुछ मिनट शांत होकर लिखिए या धीरे-धीरे दोहराइए।
इसका उद्देश्य मन को यह सिखाना है कि डर महसूस होना कमजोरी नहीं, बल्कि तनावपूर्ण परिस्थितियों के प्रति सामान्य मानवीय प्रतिक्रिया है।
इसके साथ दिन में दो बार गहरी, धीमी सांस लेने का अभ्यास करिए।
शरीर को शांत करने वाली छोटी-छोटी रिलैक्सिंग प्रैक्टिस करिए।
सप्ताह 4
व्यवहार में छोटे बदलाव करना
- मीटिंग या बॉस से बात करने से पहले दो मिनट रुककर गहरी सांस लें और शरीर को ढीला छोड़ें। इससे तनाव कम होता है।
- बार-बार ईमेल, लोगों के हावभाव या ऑफिस की अफवाहों पर नजर रखना कम करें। हर संकेत में खतरा ढूंढ़ना चिंता बढ़ाता है।
- अपने अच्छे काम, मिली सराहना और चल रहे जरूरी कामों की एक सूची बनाकर रखें। यह वास्तविक स्थिति याद दिलाने में मदद करता है।
परिवार से साफ कहें—
“काम को लेकर मैं तनाव में हूं, मेरा चिड़चिड़ापन आप लोगों की वजह से नहीं है।”
साथ ही, चिंता के लिए दिन में केवल 15–20 मिनट का तय समय रखें। बाकी समय उसे बाद के लिए टालने की कोशिश करें।

प्रोफेशनल हेल्प कब लें ?
अगर डर और घबराहट छह महीने या उससे ज्यादा समय से लगातार बनी हुई है और उसका असर नींद, काम, पारिवारिक रिश्तों या सेहत पर साफ दिखने लगा है, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी हो सकता है।

अंतिम बात
लगातार छंटनी के माहौल में डर और असुरक्षा महसूस होना स्वाभाविक है। जरूरी यह है कि व्यक्ति अपने डर को समझे, लेकिन खुद को उसके लिए दोषी न ठहराए। सही सोच, छोटे व्यवहारिक बदलाव और समय पर मदद मांगकर एंग्जाइटी को बेहतर तरीके से हैंडल किया जा सकता है। ……………… ये खबर भी पढ़िए मेंटल हेल्थ- अकेले होने पर मन घबराता है: लगता है, कुछ बुरा हो जाएगा, क्या ये नॉर्मल है, मैं इस डर से बाहर कैसे निकलूं

मनोविज्ञान में इसे अक्सर इमोशनल डिपेंडेंसी या एंक्शस अटैचमेंट पैटर्न के रूप में समझा जाता है। जॉन बॉल्बी की अटैचमेंट थ्योरी के मुताबिक, बचपन या पिछले रिश्तों के अनुभव हमारे ‘जुड़ाव के तरीके’ को तय करते हैं। आगे पढ़िए…
















