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Fri, Oct 9, 2026Updated 7:44 AM IST
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मोतिहारी: खाद की अधिक कीमत पर बिक्री को लेकर प्रशासन की कार्रवाई के बाद खुदरा विक्रेता लामबंद, उठाव-बिक्री बंद करने की दी चेतावनी

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बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के मुख्यालय मोतिहारी में उर्वरक यानी खाद की बिक्री को लेकर एक बार फिर विवाद सामने आया है। जिले में खाद की निर्धारित कीमत से अधिक दामों पर बिक्री किए जाने की शिकायतों के बाद जिला प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए कार्रवाई शुरू कर दी है। प्रशासन की इस कार्रवाई के बीच अब जिले के खुदरा उर्वरक विक्रेता भी पूरी तरह से लामबंद हो गए हैं और उन्होंने अपनी मांगों को लेकर विरोध दर्ज कराया है। दुकानदारों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो वे खाद का उठाव और बिक्री दोनों बंद कर देंगे, जिससे किसानों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

मोतिहारी में कृषि कार्य और फसलों की बुवाई के लिए खाद की निरंतर मांग बनी रहती है। ऐसे समय में जब किसानों को समय पर और उचित मूल्य पर खाद उपलब्ध होना अत्यंत आवश्यक है, तब यह पूरा मामला जिले की कृषि व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर सामने आया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिला प्रशासन को लगातार यह शिकायतें मिल रही थीं कि कुछ खुदरा दुकानदार किसानों से सरकार द्वारा तय की गई निर्धारित कीमत (एमआरपी) से अधिक पैसा वसूल रहे हैं। इन शिकायतों को संज्ञान में लेते हुए प्रशासन ने जांच अभियान चलाया और नियमों का उल्लंघन करने वाले विक्रेताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने और जुर्माना लगाने जैसी कानूनी प्रक्रियाएं शुरू कर दीं।

हालांकि, प्रशासन की इस कार्रवाई से खुदरा उर्वरक विक्रेताओं में भारी रोष व्याप्त हो गया है। दुकानदारों का कहना है कि प्रशासन बिना वास्तविक स्थिति को समझे केवल उन्हें ही निशाना बना रहा है। खुदरा विक्रेताओं ने आरोप लगाया है कि वे अपनी इच्छा से या मुनाफाखोरी के लिए खाद महंगे दामों पर नहीं बेच रहे हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि थोक विक्रेता और उर्वरक उत्पादक कंपनियां ही उन्हें निर्धारित मूल्य से अधिक कीमत पर खाद उपलब्ध करा रही हैं। जब दुकानदारों को ही थोक विक्रेताओं और कंपनियों से खाद खरीदने के लिए ज्यादा पैसा देना पड़ रहा है, तो वे किसानों को सरकारी रेट पर खाद कैसे दे सकते हैं, यह उनका मुख्य तर्क है।

इस संबंध में खुदरा विक्रेताओं ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि वर्तमान बाजार परिस्थितियों में उनके लिए निर्धारित दरों पर खाद की बिक्री करना व्यावहारिक रूप से असंभव हो गया है। उन्होंने बताया कि थोक स्तर पर खाद की कीमतें पहले से ही बढ़ी हुई हैं। कंपनियां और बड़े थोक विक्रेता अपने स्तर पर कीमतें बढ़ाकर खाद की आपूर्ति कर रहे हैं, लेकिन जब खुदरा दुकानदार उसी बढ़ी हुई कीमत को किसानों से वसूलने का प्रयास करते हैं ताकि उनका नुकसान न हो, तो प्रशासन उन पर ही कार्रवाई की तलवार लटका देता है। विक्रेताओं का मानना है कि यह नीति उनके साथ अन्यायपूर्ण है और इससे उनका व्यापार ठप होने की कगार पर आ गया है।

अपनी मांगों को लेकर एकजुट हुए खुदरा उर्वरक विक्रेताओं ने अब सरकार और प्रशासन के सामने एक प्रमुख मांग रखी है। दुकानदारों ने मांग की है कि सरकार को चाहिए कि वह उर्वरक के क्रय दर (पर्चेज रेट) को आधिकारिक तौर पर तय करे। उनका कहना है कि यदि सरकार स्पष्ट रूप से यह निर्धारित कर दे कि थोक विक्रेताओं और कंपनियों को किस दर पर खाद खुदरा विक्रेताओं को देनी है, तो इस तरह की मनमानी और भ्रम की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी। क्रय दर तय होने से न केवल दुकानदारों को राहत मिलेगी, बल्कि किसानों को भी सही कीमत पर खाद मिल सकेगा और किसी भी प्रकार की अवैध वसूली की गुंजाइश नहीं रहेगी।

विक्रेताओं ने प्रशासन को स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि अगर उनकी इस मांग पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया और थोक विक्रेताओं तथा कंपनियों की मनमानी पर रोक नहीं लगाई गई, तो वे सामूहिक रूप से खाद का उठाव और बिक्री पूरी तरह से बंद कर देंगे। दुकानदारों के इस ऐलान से जिले में हड़कंप मच गया है, क्योंकि यदि ऐसा होता है तो किसानों को खाद की भारी किल्लत का सामना करना पड़ेगा, जो सीधे तौर पर कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकता है।

इस पूरे मामले में यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि उर्वरक की कीमतें और उसकी आपूर्ति श्रृंखला एक जटिल प्रक्रिया है। खुदरा विक्रेता जहां थोक विक्रेताओं और कंपनियों पर अधिक कीमत वसूलने का आरोप लगा रहे हैं, वहीं प्रशासन का काम यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी किसान निर्धारित कीमत से अधिक भुगतान न करे। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि प्रशासन या राज्य सरकार इस मांग पर क्या रुख अपनाएगी और क्या क्रय दर को लेकर कोई नया दिशा-निर्देश जारी किया जाएगा।

पूर्वी चंपारण जिले में कृषि ही अधिकांश लोगों की आय का मुख्य स्रोत है। ऐसे में खाद की उपलब्धता और उसकी सही कीमत किसानों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न होती है। वर्तमान में किसान, खुदरा विक्रेता और प्रशासन तीनों ही इस उलझन में फंसे हुए हैं। दुकानदारों की हड़ताल की चेतावनी के बाद अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन और राज्य सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई हैं। देखना होगा कि प्रशासन इस गतिरोध को कैसे तोड़ता है और किसानों को समय पर उचित मूल्य पर खाद उपलब्ध कराने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।