Pakistan Rejects Trump Demand; Israel Recognition Controversy

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अमेरिकी थिंकटैंक अटलांटिक काउंसिल के एक्सपर्ट माइकल कुगेलमैन कहते हैं- ट्रम्प के जितना करीब जाओगे, उतना ही जोखिम बढ़ेगा। वह कुछ ऐसा मांग बैठेंगे, जो देना संभव न हो।

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पाकिस्तान इस वक्त उसी ‘कुआं और खाई’ की सिचुएशन में आ गिरा है।

25 मई की रात ट्रम्प ने पाकिस्तान समेत 6 मुस्लिम देशों को कहा कि वे ‘अब्राहम अकॉर्ड्स’ पर दस्तखत करें, यानी इजराइल को देश मानें और उससे दोस्ती करें।

सबसे पहले पाकिस्तान ने ही मना कर दिया। आखिर क्यों ?और अब होगा क्या, जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में…

1947: पाकिस्तान बनते ही दुश्मनी की शुरुआत

बात नवंबर 1947 की है। भारत को आजाद हुए अभी कुछ ही महीने हुए थे और पाकिस्तान भी नया-नया बना था। संयुक्त राष्ट्र में एक अहम वोटिंग हुई- फिलिस्तीन को दो हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव। एक हिस्सा यहूदियों को, एक अरबों को।

पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने तब चेतावनी दी कि यह बंटवारा हुआ तो मुस्लिम उम्मा (मुस्लिम देश) इसके खिलाफ उठ खड़े होंगे। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का अरबों को पूरा समर्थन रहेगा और उस प्रस्ताव के खिलाफ वोट भी किया।

14 मई 1948 को इजराइल बना। पाकिस्तान ने उसे मान्यता देने से इनकार कर दिया।

जब पाकिस्तानी पायलट ने इजराइली जेट गिराए

यह दुश्मनी सिर्फ कागजी बयानों तक नहीं रही। जून 1967 में अरब-इजराइल के बीच ‘छह दिन की जंग’ छिड़ी। पाकिस्तान ने अपने पायलट मिस्र, जॉर्डन और सीरिया की वायुसेनाओं में भेजे।

5 जून 1967 को इजराइली जेट जॉर्डन के माफ्रक एयरबेस पर हमला करने आए। जॉर्डन ने पाकिस्तानी पायलट सैफुल आजम को तैनात किया। आजम ने दो इजराइली विमान मार गिराए।

अगले दिन उन्हें इराक भेजा गया, जहां उन्होंने दो और इजराइली विमान ध्वस्त किए। यह किस्सा आज भी पाकिस्तान में गर्व के साथ सुनाया जाता है।

जंग के बाद 1967 में सैफुल आजम को राष्ट्रपति अयूब खान ने सितारा-ए-जुर्रत से नवाजा था।

जंग के बाद 1967 में सैफुल आजम को राष्ट्रपति अयूब खान ने सितारा-ए-जुर्रत से नवाजा था।

इस दुश्मनी की गहराई का अंदाजा एक और बात से लगाएं। पाकिस्तान के पासपोर्ट पर आज भी बड़े अक्षरों में छपा है- ‘Not Valid for Israel’, यानी यह पासपोर्ट इजराइल के लिए मान्य नहीं है।

दुनिया में लगभग हर देश का पासपोर्ट हर देश के लिए वैध होता है। लेकिन पाकिस्तान ने अपने नागरिकों के दस्तावेज पर ही अपनी विदेश नीति लिख दी है।

ये पाकिस्तानी पासपोर्ट की तस्वीर है, जिस पर लिखा है- ‘यह पासपोर्ट दुनिया के सभी देशों के लिए वैध है, सिर्फ इजराइल छोड़कर।’

ये पाकिस्तानी पासपोर्ट की तस्वीर है, जिस पर लिखा है- ‘यह पासपोर्ट दुनिया के सभी देशों के लिए वैध है, सिर्फ इजराइल छोड़कर।’

जब मुशर्रफ ने दरवाजा खटखटाया, फिर दबे पांव लौट आए

इस 78 साल के इतिहास में एक दिलचस्प मोड़ 2005 में आया। पाकिस्तानी जनरल परवेज मुशर्रफ ने पर्दे के पीछे इजराइल से संपर्क शुरू किया। तुर्किए की मदद से 1 सितंबर 2005 को इस्तांबुल में पाकिस्तानी विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी और इजराइली विदेश मंत्री सिल्वान शालोम की मुलाकात हुई। दोनों देशों के बीच यह पहली सार्वजनिक और आधिकारिक बातचीत थी।

इसके कुछ दिन बाद मुशर्रफ UN में इजराइली प्रधानमंत्री एरियल शेरॉन से मिले। किसी पाकिस्तानी शासक का इजराइली नेता से पहला सार्वजनिक मेलजोल था।

मुशर्रफ इजराइल के बारे में इंटरव्यू देने वाले पहले पाकिस्तानी मुस्लिम नेता बने और अमेरिका में वर्ल्ड ज्यूइश कांग्रेस को संबोधित करने वाले पहले मुस्लिम नेता भी, लेकिन इसके बाद पाकिस्तान में भूचाल आ गया।

17 सितंबर, 2005 को न्यूयॉर्क में मुशर्रफ ने यहूदी समुदाय को संबोधित किया था। इसी दौरान वे अमेरिकन ज्यूइश कांग्रेस के अध्यक्ष जैक रोसेन (दाएं) से मिले थे।

17 सितंबर, 2005 को न्यूयॉर्क में मुशर्रफ ने यहूदी समुदाय को संबोधित किया था। इसी दौरान वे अमेरिकन ज्यूइश कांग्रेस के अध्यक्ष जैक रोसेन (दाएं) से मिले थे।

मुत्ताहिदा मजलिस-ए-अमल, जमात-ए-इस्लामी और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम जैसे कट्टपंथी धार्मिक संगठनों ने मुशर्रफ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। सड़कों पर हिंसक प्रदर्शन होने लगे। मुशर्रफ पर ‘इस्लाम और फिलिस्तीन से गद्दारी’ करने के आरोप लगे। अपनी कुर्सी बचाने के लिए मुशर्रफ को कदम पीछे खींचने पड़े।

2003 में जब मुशर्रफ ने कैंप डेविड दौरे पर इजराइल से बेहतर रिश्तों की बात की थी, तब भी इसे फौरन दबा दिया गया था, क्योंकि पाकिस्तान में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। 2005 की कोशिश भी आगे नहीं बढ़ी।

यही पाकिस्तान की असली मुश्किल है। ऊपर से नेता चाहें भी, तो नीचे जनता और धार्मिक संगठन इसे नहीं होने देंगे।

आज ट्रम्प ने इजराइल से दोस्ती की मांग क्यों रखी

23 मई को ट्रम्प ने सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र और जॉर्डन के नेताओं से वर्चुअल बैठक की। दो दिन बाद ट्रूथ सोशल पर लिखा कि ईरान से बातचीत आगे बढ़ रही है, लेकिन इन सभी देशों को ‘अब्राहम अकॉर्ड्स’ पर साइन करना होगा।

अब्राहम अकॉर्ड्स ट्रम्प ने ही अपने पहले कार्यकाल 2020 में बनाया था। मकसद था कि मुस्लिम देश इजराइल को मान्यता दें और उससे रिश्ते बनाएं। अब तक UAE, बहरीन, मोरक्को, सूडान और कजाकिस्तान इस पर दस्तखत कर चुके हैं।

ट्रम्प के पोस्ट में एक लाइन और थी- ‘कुछ देशों के पास इसमें शामिल न होने की एक-दो वजहें हो सकती हैं।’ जानकार इसे पाकिस्तान के लिए ‘बाहर निकलने का दरवाजा’ मान रहे हैं। शायद ट्रम्प पाकिस्तान को इससे बाहर रखने के लिए तैयार हों।

सितंबर 2025 में पाक पीएम शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से मिले थे। मौजूदा समय में दोनों ही ट्रम्प के 'खास' माने जाते हैं।

सितंबर 2025 में पाक पीएम शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से मिले थे। मौजूदा समय में दोनों ही ट्रम्प के ‘खास’ माने जाते हैं।

पाकिस्तान ने साफ मना कर दिया

पिछले साल भी चर्चा थी कि पाकिस्तान अब्राहम अकॉर्ड साइन करने वाला है। तब पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा था कि हम तब तक इजराइल को मान्यता नहीं देंगे, जब तक आजाद फिलिस्तीन नहीं बनता।

ट्रम्प की मांग के बाद रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने पाकिस्तानी न्यूज चैनल ‘समा टीवी’ से कहा, ‘हम ऐसे किसी समझौते में शामिल नहीं होंगे, जो हमारी सोच के खिलाफ हो।’

अमेरिकी थिंकटैंक अटलांटिक काउंसिल में दक्षिण एशिया के सीनियर फेलो माइकल कुगेलमैन मानते हैं कि इजराइल को लेकर पाकिस्तान का रूख अटल है। फिलहाल अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होना पाकिस्तान के लिए मुमकिन नहीं है।

पाकिस्तान की पूर्व एम्बेसडर डॉ. मलीहा लोधी के मुताबिक, ट्रम्प की मांग को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। ईरान के साथ होने वाले संभावित समझौते की रिपब्लिकन पार्टी और इजराइली लॉबी आलोचना कर रही है। ट्रम्प इसी का जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तान, सऊदी अरब या कोई भी मुस्लिम देश इजराइल को मान्यता नहीं देगा और अब्राहम अकॉर्ड में शामिल नहीं होगा।

यह इनकार इतनी आसानी से क्यों आया? क्योंकि पाकिस्तान के लिए इजराइल को मानने की कीमत सिर्फ कूटनीतिक नहीं, घरेलू राजनीतिक है।

पाकिस्तान में इमरान खान की पार्टी पहले से ही सरकार के खिलाफ है। इस पर तहरीक-ए-तालिबान जैसे कट्टरपंथी संगठन भी हैं। इजराइल से दोस्ती की खबर आते ही इन सबको सड़कों पर उतरने का बड़ा मुद्दा मिल जाएगा।

इसकी धार्मिक वजह भी है। पाकिस्तान खुद को इस्लामिक दुनिया का मसीहा मानता है और इकलौता इस्लामिक देश है, जिसके पास परमाणु बम है। ऐसे में इजराइल को देश मानना पाकिस्तान की सोच के खिलाफ है। ऐसा करने से इस्लामिक दुनिया में उसकी साख मिट्टी में मिल जाएगी।

अमेरिका-ईरान जंग के बीच मिस्र, सऊदी अरब और तुर्किए के विदेश मंत्रियों ने पाकिस्तान का दौरा किया था। ये चारों ही देश मुस्लिम बहुल हैं।

अमेरिका-ईरान जंग के बीच मिस्र, सऊदी अरब और तुर्किए के विदेश मंत्रियों ने पाकिस्तान का दौरा किया था। ये चारों ही देश मुस्लिम बहुल हैं।

लेकिन ट्रम्प को ‘न’ कहना भी महंगा पड़ सकता है

पाकिस्तान आर्थिक रूप से बेहद कमजोर स्थिति में है। 2024 में IMF से मिला 7 अरब डॉलर का कर्ज पाकिस्तान का 24वां बेलआउट था। किसी भी देश के लिए सबसे ज्यादा। पाकिस्तान का कुल कर्ज उसकी GDP के 70% से ज्यादा है और सरकार की आधी से ज्यादा कमाई सिर्फ कर्ज का ब्याज चुकाने में चली जाती है।

IMF में अमेरिका के पास सबसे ज्यादा 16.5% वोटिंग अधिकार हैं। अगर वॉशिंगटन ने पाकिस्तान के खिलाफ खड़े होने का फैसला किया, तो इस्लामाबाद के लिए अगला लोन मिलना मुश्किल हो जाएगा।

इसके अलावा पाकिस्तान की वायुसेना का सबसे ताकतवर विमान अमेरिकी F-16 है। इसकी मरम्मत, सॉफ्टवेयर अपडेट और तकनीकी सहायता के लिए पाकिस्तान पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर है। पिछले साल ट्रम्प प्रशासन ने इसके रखरखाव के लिए 397 मिलियन डॉलर मंजूर किए थे।

पाकिस्तान ने ईरान और अमेरिका के बीच बिचौलिया बनकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी साख बढ़ाने की कोशिश की। ट्रम्प ने इसके बदले में शहबाज शरीफ को ‘दोस्त’ और आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर को ‘पसंदीदा फील्ड मार्शल’ कहा।

फिलहाल पाकिस्तान ने ट्रम्प की मांग पर ‘नहीं’ कह दिया है। अब देखना यह है कि ट्रम्प इस ‘नहीं’ को सुनते हैं, या अनसुना कर देते हैं।

ट्रम्प ने बुधवार को चेतावनी दी है कि अगर पाकिस्तान और अरब देश इजराइल को औपचारिक रूप से मान्यता देने पर राजी नहीं हुए, तो वे संभावित शांति समझौते से पीछे हट सकते हैं।

व्हाइट हाउस की कैबिनेट बैठक में ट्रम्प ने कहा कि पाकिस्तान, सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों को अमेरिका के कहने पर अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होना चाहिए। ईरान के साथ होने वाला पूरा समझौता इसी शर्त पर टिका हो सकता है।

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