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फर्जी आईटीआई सर्टिफिकेट से रेलवे में लोको पायलट की नौकरी: बिलासपुर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की, कैट का दंड बढ़ाने का आदेश बरकरार

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित उच्च न्यायालय ने रेलवे में लोको पायलट के पद पर कार्यरत एक कर्मचारी की याचिका को खारिज कर दिया है। इस कर्मचारी पर फर्जी आईटीआई प्रमाणपत्र और अंकसूची के आधार पर नौकरी प्राप्त करने का गंभीर आरोप सिद्ध हुआ था। विभागीय जांच में यह बात सामने आई थी कि उसने रेलवे में नियुक्ति पाने के लिए इलेक्ट्रीशियन ट्रेड की फर्जी अंकसूची प्रस्तुत की थी। उच्च न्यायालय ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) द्वारा दिए गए उस आदेश को पूरी तरह से उचित और वैध ठहराया है, जिसमें संबंधित कर्मचारी के खिलाफ दी गई अनुशासनात्मक कार्रवाई और दंड को बढ़ाने का निर्णय लिया गया था।

इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब रेलवे प्रशासन को इस बात की जानकारी मिली कि लोको पायलट के रूप में काम कर रहे एक कर्मचारी ने अपनी भर्ती प्रक्रिया के दौरान जो शैक्षणिक दस्तावेज जमा किए थे, उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है। इसके बाद रेलवे प्रशासन ने इस मामले की गहन विभागीय जांच शुरू की। जांच के दौरान यह तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आया कि उक्त कर्मचारी ने नौकरी हासिल करने के लिए औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) के इलेक्ट्रीशियन ट्रेड की फर्जी अंकसूची प्रस्तुत की थी। यह अंकसूची किसी मान्यता प्राप्त संस्थान द्वारा जारी नहीं की गई थी, बल्कि इसे जानबूझकर नौकरी पाने के उद्देश्य से तैयार किया गया था।

विभागीय जांच को और अधिक मजबूत बनाने के लिए रेलवे अधिकारियों ने उस संबंधित आईटीआई संस्थान से भी संपर्क किया, जिसकी अंकसूची कर्मचारी ने अपने दस्तावेजों में लगाई थी। जांच के क्रम में संबंधित संस्थान के प्राचार्य ने स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया कि उक्त व्यक्ति ने उनके संस्थान से कोई प्रशिक्षण लिया हो। प्राचार्य ने पुष्टि की कि न तो इस कर्मचारी ने उनके यहां इलेक्ट्रीशियन ट्रेड में प्रवेश लिया था और न ही संस्थान की ओर से उसके नाम से कोई अंकसूची जारी की गई थी। प्राचार्य के इस बयान और लिखित इनकार ने विभागीय जांच में फर्जीवाड़े को पूरी तरह से साबित कर दिया।

जांच रिपोर्ट के आधार पर रेलवे प्रशासन ने कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उसे दंडित किया। हालांकि, कर्मचारी इस कार्रवाई से संतुष्ट नहीं था और उसने इस मामले को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) में चुनौती दी। कैट ने मामले की सुनवाई के दौरान सभी तथ्यों, विभागीय जांच रिपोर्ट और संबंधित आईटीआई संस्थान के प्राचार्य के बयान का गहन अवलोकन किया। कैट ने पाया कि कर्मचारी द्वारा प्रस्तुत किया गया प्रमाणपत्र निश्चित रूप से फर्जी था और उसने धोखाधड़ी के माध्यम से रेलवे जैसे अत्यंत संवेदनशील विभाग में नौकरी प्राप्त की थी।

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) ने इस गंभीर कदाचार को देखते हुए रेलवे प्रशासन की कार्रवाई को सही ठहराया और साथ ही कर्मचारी के खिलाफ दंड को बढ़ाने का आदेश पारित किया। कैट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि लोको पायलट जैसे महत्वपूर्ण पद पर, जहां हजारों यात्रियों की सुरक्षा सीधे तौर पर जुड़ी होती है, ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति फर्जी दस्तावेजों के आधार पर होना बेहद गंभीर अपराध है। इसलिए, इसके लिए कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई और बढ़ा हुआ दंड पूरी तरह से न्यायोचित है।

कैट के इस आदेश के बाद, लोको पायलट ने बिलासपुर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और कैट के फैसले को चुनौती देते हुए राहत की गुहार लगाई। उसने अपनी याचिका में कैट द्वारा दंड बढ़ाने के आदेश को रद्द करने की मांग की। बिलासपुर उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध दस्तावेजों का विस्तृत परीक्षण किया। अदालत ने देखा कि विभागीय जांच में फर्जीवाड़ा पूरी तरह से सिद्ध हो चुका है और संबंधित संस्थान के प्राचार्य ने भी प्रशिक्षण और अंकसूची जारी होने से साफ इनकार किया है।

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर सरकारी नौकरी प्राप्त करना न केवल धोखाधड़ी है, बल्कि यह संवैधानिक प्रावधानों और सेवा नियमों का सीधा उल्लंघन भी है। अदालत ने माना कि कैट ने तथ्यों और कानून के दायरे में रहकर ही दंड बढ़ाने का निर्णय लिया था, जो कि परिस्थितियों के अनुरूप बिल्कुल उचित था। न्यायालय ने कर्मचारी की याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया और कैट के आदेश को यथावत बरकरार रखा।

इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि सरकारी विभागों, विशेषकर रेलवे जैसे सुरक्षा-संवेदनशील क्षेत्रों में, फर्जी दस्तावेजों के जरिए नौकरी पाने वालों के खिलाफ प्रशासन और न्यायपालिका दोनों ही सख्त रुख अपनाएंगे। लोको पायलट का पद ट्रेनों के संचालन और यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। ऐसे पद पर यदि कोई व्यक्ति फर्जी योग्यता के साथ बैठता है, तो वह न केवल नियमों का उल्लंघन करता है, बल्कि आम जनता की जान को भी खतरे में डालता है। बिलासपुर उच्च न्यायालय का यह निर्णय ऐसे मामलों में जीरो टॉलरेंस नीति को और अधिक मजबूत करता है।