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Sat, Oct 10, 2026Updated 3:53 PM IST
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फर्जी आईटीआई सर्टिफिकेट से रेलवे में नौकरी: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लोको पायलट की याचिका खारिज की, दंड बढ़ाने के कैट आदेश को माना उचित

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बिलासपुर। वंदे भारत न्यूज़। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (बिलासपुर हाईकोर्ट) ने भारतीय रेलवे में कार्यरत एक लोको पायलट द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया है। यह याचिका फर्जी आईटीआई प्रमाण पत्र और अंकसूची के आधार पर नौकरी प्राप्त करने के मामले में विभागीय कार्रवाई के खिलाफ दायर की गई थी। उच्च न्यायालय ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) द्वारा दिए गए उस आदेश को पूरी तरह से बरकरार रखा है, जिसमें लोको पायलट को दी गई अनुशासनात्मक कार्रवाई और उसके दंड को बढ़ाने के निर्णय को उचित ठहराया गया था। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि फर्जी दस्तावेजों के सहारे सरकारी नौकरी हासिल करना एक गंभीर कदाचार है और ऐसे मामलों में विभाग द्वारा की गई सख्त कार्रवाई कानूनन वैध है।

मामले की विस्तृत जानकारी के अनुसार, संबंधित व्यक्ति रेलवे में लोको पायलट के पद पर कार्यरत था। उसकी नियुक्ति के दौरान प्रस्तुत किए गए शैक्षणिक दस्तावेजों पर जब संदेह व्यक्त किया गया, तो रेलवे प्रशासन ने इस मामले में एक विस्तृत विभागीय जांच बिठाई। विभागीय जांच के दौरान यह गंभीर तथ्य सामने आया कि लोको पायलट ने रेलवे में नौकरी पाने के लिए जो दस्तावेज जमा किए थे, उनमें शामिल आईटीआई का प्रमाण पत्र और अंकसूची पूरी तरह से फर्जी थी। जांच में पाया गया कि उसने इलेक्ट्रीशियन ट्रेड में प्रशिक्षण प्राप्त करने का दावा करते हुए जो अंकसूची प्रस्तुत की थी, वह वास्तविक नहीं थी और न ही उसे किसी मान्यता प्राप्त संस्थान द्वारा जारी किया गया था।

विभागीय जांच को और अधिक पुख्ता बनाने के लिए जांच अधिकारियों ने संबंधित आईटीआई संस्थान से भी संपर्क किया और दस्तावेजों का सत्यापन कराया। इस दौरान उस संस्थान के प्राचार्य ने लिखित रूप से स्पष्ट किया कि आरोपित लोको पायलट ने उनके संस्थान से इलेक्ट्रीशियन ट्रेड में कोई प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया था। प्राचार्य ने इस बात से भी साफ इनकार कर दिया कि संस्थान द्वारा उसे कोई अंकसूची या प्रमाण पत्र जारी किया गया हो। प्राचार्य के इस बयान और संस्थान के रिकॉर्ड की जांच ने यह निर्विवाद रूप से सिद्ध कर दिया कि नौकरी के लिए प्रस्तुत किया गया आईटीआई का दस्तावेज फर्जी था और इसे जानबूझकर धोखाधड़ी की नीयत से तैयार करके जमा कराया गया था।

विभागीय जांच में दोषी पाए जाने के बाद रेलवे प्रशासन ने लोको पायलट के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की। चूंकि फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से सरकारी नौकरी प्राप्त करना सेवा नियमों का गंभीर उल्लंघन माना जाता है, इसलिए रेलवे अधिकारियों ने उसके खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए उसके दंड को बढ़ाने की कार्रवाई की। रेलवे प्रशासन का मानना था कि जिस व्यक्ति ने नौकरी पाने के लिए ही फर्जीवाड़े का सहारा लिया हो, उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब वह लोको पायलट जैसे अत्यंत संवेदनशील और सुरक्षा से जुड़े पद पर कार्यरत हो। लोको पायलट की जिम्मेदारी ट्रेनों का सुरक्षित संचालन करना होती है और ऐसे पद पर नियुक्ति के लिए शैक्षणिक योग्यता और तकनीकी प्रशिक्षण का प्रामाणिक होना अनिवार्य है।

रेलवे प्रशासन द्वारा दंड बढ़ाए जाने और की गई विभागीय कार्रवाई से असंतुष्ट होकर लोको पायलट ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) का दरवाजा खटखटाया था। उसने कैट के समक्ष अपनी याचिका दायर करके रेलवे प्रशासन की कार्रवाई को चुनौती दी और दंड को कम करने या कार्रवाई को रद्द करने की मांग की। हालांकि, कैट ने मामले की सुनवाई के दौरान सभी तथ्यों, विभागीय जांच रिपोर्ट और संबंधित आईटीआई संस्थान के प्राचार्य के बयानों का गहनता से अध्ययन किया। कैट ने यह पाया कि विभागीय जांच में लगाए गए आरोप सही हैं और फर्जी अंकसूची प्रस्तुत करने का मामला पूरी तरह से सिद्ध होता है। इसके आधार पर कैट ने रेलवे प्रशासन द्वारा दंड बढ़ाने की कार्रवाई को उचित और न्यायोचित ठहराते हुए लोको पायलट की याचिका को खारिज कर दिया था।

कैट के आदेश से संतुष्ट न होने पर लोको पायलट ने बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। उच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई हुई, जहां दोनों पक्षों की दलीलों और निचले निकायों के आदेशों का अवलोकन किया गया। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कैट के आदेश में कोई हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझा। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी प्राप्त करना एक संगठित धोखाधड़ी है और ऐसे कृत्य के लिए विभाग द्वारा दी गई सजा में कोई कमी नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट ने कैट द्वारा दंड बढ़ाने की कार्रवाई को माना उचित ठहराते हुए लोको पायलट की याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का यह फैसला सरकारी नौकरियों में फर्जी दस्तावेजों के सहारे प्रवेश करने वालों के खिलाफ एक कड़ा संदेश है। अदालत के इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि यदि कोई व्यक्ति फर्जी आईटीआई सर्टिफिकेट या अन्य किसी फर्जी अंकसूची का उपयोग करके रेलवे या किसी अन्य सरकारी विभाग में नौकरी हासिल करता है, तो उसके खिलाफ की जाने वाली विभागीय कार्रवाई और दंड को न्यायालयों में चुनौती देना आसान नहीं होगा। रेलवे जैसे विभागों में, जहां कर्मचारियों की तकनीकी योग्यता सीधे तौर पर लाखों यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ी होती है, वहां फर्जीवाड़े को लेकर प्रशासन और न्यायपालिका दोनों का रुख बेहद सख्त रहता है। बिलासपुर हाईकोर्ट के इस ताजा फैसले ने विभागीय जांचों की विश्वसनीयता और कैट के आदेशों की वैधता को एक बार फिर मजबूती प्रदान की है।