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Fri, Oct 9, 2026Updated 7:47 AM IST
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फरक्का जल संधि बिहार के हित में नहीं: समस्तीपुर में नीतीश संवाद के दौरान संजय झा ने 2050 की जल जरूरतों को ध्यान में रखकर नया समझौता करने की मांग की

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समस्तीपुर। वंदे भारत न्यूज़ ब्यूरो। जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा ने फरक्का जल संधि को लेकर एक महत्वपूर्ण और स्पष्ट बयान दिया है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुई फरक्का जल संधि बिहार राज्य के हित में नहीं है। समस्तीपुर में आयोजित ‘नीतीश संवाद’ कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में संजय झा ने इस ऐतिहासिक जल समझौते पर अपनी चिंताएं व्यक्त कीं और भविष्य की रणनीति को लेकर एक स्पष्ट दिशा निर्धारित की। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में यदि इस समझौते को लेकर कोई नया करार होता है, तो उसमें बिहार की वर्ष 2050 तक की जल जरूरतों को पूरी तरह से ध्यान में रखा जाना चाहिए।

समस्तीपुर में आयोजित ‘नीतीश संवाद’ कार्यक्रम के मंच से संजय झा ने गंगा जल के बंटवारे और फरक्का बैराज से जुड़े मुद्दे पर विस्तार से बात रखी। जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मौजूदा फरक्का जल संधि बिहार के व्यापक हितों की अनदेखी करती है। उनका तर्क था कि इस संधि के प्रावधानों के कारण बिहार को गंगा नदी का वह उचित हिस्सा नहीं मिल पाता है, जिसका वह अधिकारी है। संजय झा ने उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए जोर देकर कहा कि जब भी आगे चलकर इस संधि की अवधि समाप्त होगी या इस पर कोई नई बातचीत शुरू होगी, तो बिहार के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

संजय झा ने विशेष रूप से वर्ष 2050 की समय सीमा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि किसी भी नए समझौते को तैयार करते समय केवल वर्तमान परिस्थितियों को ही नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की जरूरतों को भी आधार बनाना होगा। वर्ष 2050 तक बिहार की जनसंख्या में भारी वृद्धि होने का अनुमान है। ऐसे में कृषि सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और औद्योगिक विकास के लिए पानी की मांग कई गुना बढ़ जाएगी। संजय झा ने कहा कि इन सभी भविष्य की जल जरूरतों को ध्यान में रखकर ही आगे का समझौता होना चाहिए, ताकि बिहार के किसानों और आम नागरिकों को पानी की किल्लत का सामना न करना पड़े।

बता दें कि भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के जल बंटवारे को लेकर 12 दिसंबर 1996 को फरक्का जल संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। यह संधि 30 वर्षों की अवधि के लिए लागू की गई थी। इस समझौते के तहत फरक्का बैराज पर गंगा के पानी को दोनों देशों के बीच एक निश्चित सूत्र के आधार पर बांटा जाता है। हालांकि, बिहार सहित कई अन्य राज्यों के नेताओं और जल विशेषज्ञों की ओर से समय-समय पर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि इस संधि में भारत के ऊपरी हिस्सों, खासकर बिहार के हितों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी गई है। गर्मी के महीनों में जब गंगा में पानी का स्तर कम हो जाता है, तो बिहार के कई इलाकों में सिंचाई और पेयजल की गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाती है।

‘नीतीश संवाद’ कार्यक्रम के दौरान संजय झा ने बिहार के विकास और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की दूरदर्शी सोच का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार हमेशा से बिहार के संसाधनों और उसके अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहे हैं। जल संसाधन के मामले में बिहार की स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। एक तरफ राज्य में बाढ़ की विभीषिका होती है, तो दूसरी तरफ सूखे जैसे हालात भी पैदा हो जाते हैं। ऐसे में फरक्का जल संधि जैसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों का सीधा असर बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन पर पड़ता है।

संजय झा के इस बयान को राजनीतिक और नीतिगत दोनों दृष्टिकोणों से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष द्वारा वर्ष 2050 की जल जरूरतों का जिक्र करना यह दर्शाता है कि पार्टी भविष्य की चुनौतियों को लेकर पहले से ही सचेत है और केंद्र सरकार से इस दिशा में ठोस कदम उठाने की अपेक्षा कर रही है। चूंकि 1996 की संधि 30 वर्षों के लिए थी, इसलिए आने वाले समय में इसकी समीक्षा या नवीनीकरण का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता से उठना तय है। ऐसे में संजय झा का यह बयान बिहार के जल अधिकारों की लड़ाई को एक नई दिशा देने वाला साबित हो सकता है।

समस्तीपुर में आयोजित इस ‘नीतीश संवाद’ कार्यक्रम में बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य जनता के बीच सरकार की उपलब्धियों को रखना और भविष्य की चुनौतियों पर विचार-विमर्श करना था। संजय झा ने फरक्का जल संधि के अलावा भी बिहार से जुड़े अन्य समसामयिक मुद्दों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि बिहार का विकास तभी संभव है जब उसके प्राकृतिक संसाधनों, विशेषकर जल संसाधनों का उचित और न्यायसंगत बंटवारा सुनिश्चित किया जाए।

अंततः, संजय झा ने अपनी बात को दोहराते हुए कहा कि 1996 की फरक्का जल संधि बिहार के हित में नहीं है और भविष्य में होने वाले किसी भी नए करार में राज्य की वर्ष 2050 तक की सभी जल जरूरतों को केंद्र में रखकर ही कोई फैसला लिया जाना चाहिए। यह बयान बिहार के जल राजनीति और अंतरराष्ट्रीय जल संधियों पर राज्य के रुख को स्पष्ट करने वाला एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गया है।