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Mon, Oct 12, 2026Updated 10:44 AM IST
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रायसेन में सामान्य से 300 मिमी कम बारिश का संकट: धान की फसल सूखने लगी, गेहूं का रकबा 71 हजार हेक्टेयर घटने का अनुमान, चने की बोवनी बढ़ाने पर जोर

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रायसेन। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में इस वर्ष मानसून ने किसानों को भारी निराशा दी है। जिले में इस साल सामान्य से करीब 300 मिलीमीटर कम बारिश दर्ज की गई है। वर्षा में इस भारी कमी का सीधा और गंभीर असर जिले की कृषि व्यवस्था तथा जलस्रोतों पर पड़ रहा है। खेतों में नमी की कमी के कारण फसलों की स्थिति बिगड़ती जा रही है और किसानों के सामने आगामी रबी सीजन की बुवाई को लेकर भी बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। मौजूदा हालात को देखते हुए प्रशासन और कृषि विभाग द्वारा फसल चक्र में बदलाव की रणनीति पर काम किया जा रहा है।

धान की फसल पर पड़ा गहरा संकट
बारिश में भारी कमी का सबसे ज्यादा असर खरीफ सीजन की प्रमुख फसल धान पर पड़ा है। जिले के कई क्षेत्रों में धान की फसल को पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं मिल पाया है। इसके परिणामस्वरूप खेतों में खड़ी धान की फसल सूखने लगी है और पत्तियां पीली पड़ने लगी हैं। जिन खेतों में सिंचाई के वैकल्पिक साधन उपलब्ध नहीं हैं, वहां किसानों की मेहनत पर पानी फिरता नजर आ रहा है। धान की फसल के लिए अंतिम चरण में पर्याप्त नमी अत्यंत आवश्यक होती है, लेकिन 300 मिलीमीटर कम बारिश के कारण खेतों में दरारें पड़ने लगी हैं। किसानों को अपनी फसल को बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है, लेकिन जलस्रोतों में भी पानी की कमी होने के कारण सिंचाई की व्यवस्था दुरुस्त करना एक बड़ी समस्या बन गया है।

गेहूं के रकबे में भारी गिरावट का अनुमान
खरीफ सीजन में हुई बारिश की कमी का असर अब आगामी रबी सीजन की तैयारियों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। रायसेन जिले में रबी सीजन की प्रमुख फसल गेहूं का रकबा इस बार लगभग 71 हजार हेक्टेयर तक घटने का अनुमान लगाया जा रहा है। गेहूं की बुवाई के लिए खेतों में उचित नमी (घास) का होना बेहद जरूरी होता है। वर्तमान में खेतों में नमी का अभाव है और जलस्रोत भी सूखने की कगार पर हैं। ऐसी स्थिति में किसानों के पास गेहूं की बुवाई के लिए पर्याप्त सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध नहीं होंगी। यही कारण है कि गेहूं के रकबे में इतनी बड़ी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। गेहूं का रकबा घटने से जहां किसानों की आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, वहीं जिले के कुल खाद्यान्न उत्पादन में भी भारी कमी आने की संभावना है।

चने की बोवनी बढ़ाने पर विशेष जोर
गेहूं के रकबे में अपेक्षित भारी गिरावट को देखते हुए कृषि विभाग और प्रशासन ने वैकल्पिक फसल योजना के तहत चने की बोवनी का रकबा बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। चना एक कम पानी वाली फसल है और इसे गेहूं की तुलना में काफी कम सिंचाई की आवश्यकता होती है। सूखे जैसे हालात में चना किसानों के लिए एक सुरक्षित और लाभदायक विकल्प साबित हो सकता है। कृषि अधिकारियों का मानना है कि यदि किसान गेहूं की जगह या उसके साथ चने की खेती पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो वे कम पानी में भी बेहतर पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए किसानों को चने की उन्नत किस्मों के बीजों की जानकारी दी जा रही है और उन्हें कम पानी वाली फसलें अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। चने की बोवनी बढ़ाने की यह रणनीति किसानों को सूखे से होने वाले आर्थिक नुकसान से बचाने का एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

जलस्रोतों पर बढ़ता दबाव
300 मिलीमीटर कम बारिश का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि जिले के जलस्रोतों पर भी इसका गहरा प्रभाव दिख रहा है। तालाबों, बावड़ियों और छोटे-मोटे जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य से काफी नीचे चला गया है। भूजल स्तर में भी गिरावट दर्ज की जा रही है, जिससे नलकूपों और कुओं से पर्याप्त पानी निकालने में भी दिक्कतें आ रही हैं। जलस्रोतों में पानी की इस कमी के कारण रबी सीजन में सिंचाई की व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। यदि आने वाले समय में कोई असामयिक बारिश नहीं होती है, तो पेयजल और कृषि दोनों क्षेत्रों में पानी की किल्लत और अधिक बढ़ सकती है।

किसानों के लिए सलाह और प्रशासनिक तैयारी
इस संकट की घड़ी में कृषि विभाग द्वारा किसानों को मौसम और मिट्टी की नमी के अनुसार ही फसल चयन करने की सलाह दी जा रही है। विभाग की ओर से किसानों को यह सुझाव दिया जा रहा है कि वे उन फसलों की ओर रुख करें जिन्हें कम पानी की जरूरत होती है। चने के अलावा अन्य कम पानी वाली फसलों पर भी विचार किया जा सकता है। प्रशासन स्तर पर स्थिति की लगातार निगरानी की जा रही है ताकि किसानों को समय रहते आवश्यक मार्गदर्शन और सहायता प्रदान की जा सके। रायसेन जिले में 300 मिलीमीटर कम बारिश ने जहां एक ओर धान की फसल को नुकसान पहुंचाया है, वहीं दूसरी ओर गेहूं के रकबे में 71 हजार हेक्टेयर की संभावित कमी ने कृषि अर्थव्यवस्था के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। ऐसे में चने की बोवनी बढ़ाने का लक्ष्य किसानों के लिए एक उम्मीद की किरण साबित हो सकता है।