7 घंटे पहलेलेखक: तेजस्वी ठाकुर
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किताब का नाम- मोरीसाकी बुकशॉप के खुशनुमा दिन
(अंग्रेजी किताब ’डेज एट द मोरीसाकी बुकशॉप’ का हिंदी अनुवाद)
लेखक- सातोशी यागीसावा
अनुवाद- मदन सोनी
प्रकाशक- मंजुल पब्लिकेशन
मूल्य- 299 रुपए
ब्रिटिश फिलॉसफर फ्रांसिस बेकन ने कभी कहा था ‘कुछ किताबें केवल चखने के लिए होती हैं, कुछ निगल जाने के लिए और कुछ को चबा-चबाकर आत्मसात करना पड़ता है।’ उनका यह कथन जापानी लेखक सातोशी यागीसावा की किताब ‘मोरीसाकी बुकशॉप के खुशनुमा दिन’ पर सटीक बैठता है।
इसे पढ़ते हुए लगता है कि हम चंद पन्ने नहीं पलट रहे, बल्कि किसी की जिंदगी के कुछ साल जी रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे किताब आगे बढ़ती है, यह अकेलेपन, प्रेम, पछतावे, क्षमा और दोबारा जीना सीखने की कहानी बन जाती है।
जापान के जिम्बोचो इलाके में स्थित एक छोटी-सी पुरानी किताबों की दुकान इस कहानी का सेंटर है। इसमें न कोई रहस्य है, न तेज रफ्तार और न ही ऐसे मोड़ जो चौंका दें। फिर भी आखिरी पन्ना पलटने के बाद इसके किरदार लंबे समय तक याद रहते हैं।
किताब पढ़ते हुए लगता है कि लेखक किताबों की नहीं, उन लोगों की बात कर रहे हैं, जो अपने भीतर कोई ऐसा दुख लेकर चलते हैं, जिसे वे किसी से कह नहीं पाते। तकाको का धीरे-धीरे संभलना, सातोरू की दयालुता, मोमोको का मुस्कुराते हुए अपना दर्द छिपाना और बिना किसी वादे के किसी का इंतजार करना ही इस उपन्यास की असली ताकत है।

किताब की सबसे असरदार बात
इस किताब की सबसे असरदार बात है इसकी ईमानदारी। यह किताब दुख को खूबसूरत बनाने की कोशिश नहीं करती। यहां कोई बड़ी-बड़ी बातें नहीं हैं, कोई प्रेरणादायक भाषण नहीं है। लोग टूटते हैं, गलतियां करते हैं, भाग जाते हैं, चुप रहते हैं और कई बार अपने सबसे प्रिय लोगों को भी चोट पहुंचाते हैं।
मोमोको का कैरेक्टर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब उनके अतीत, उनके खोए हुए बच्चे, उनके अपराधबोध और उनकी बीमारी के बारे में पता चलता है, तब महसूस होता है कि कई बार इंसान बाहर से जितना हंसता हुआ दिखाई देता है, भीतर से उतना ही अकेला हो सकता है।
किताब बार-बार यह एहसास कराती है कि हर व्यक्ति अपने भीतर कोई ऐसा दुख लेकर चलता है जिसके बारे में दुनिया को पता नहीं होता।
जैसा कि रूसी लेखक दोस्तोयेव्स्की ने लिखा था ‘हर इंसान में एक ऐसा दर्द होता है, जो सिर्फ उसी का होता है।’ मोमोको उस पंक्ति की जिंदा मिसाल लगती हैं।
किताब की 10 मुख्य बातें ग्राफिक में देखिए-

वे किस्से, जो याद रह जाते हैं
इस किताब में बहुत बड़े घटनाक्रम नहीं हैं, लेकिन छोटे-छोटे दृश्य लंबे समय तक याद रहते हैं। जैसे तकाको का मोरीसाकी बुकशॉप में आकर रहना। एक ऐसी लड़की, जो प्रेम में चोट खाकर लगभग जीवन से हार मान चुकी थी और फिर धीरे-धीरे किताबों के बीच खुद को दोबारा खोजने लगती है।
फिर अकिरा वादा के साथ उसकी बातचीत। दोनों के बीच जो रिश्ता बनता है, वह किसी फिल्मी प्रेम कहानी की तरह नहीं है। उसमें झिझक है, दूरी है, अनिश्चितता है। शायद इसलिए वह वास्तविक लगता है।
लेकिन किताब का सबसे भावुक हिस्सा मोमोको और तकाको की पहाड़ों वाली यात्रा है। पहाड़ की चोटी पर बैठकर मोमोको का अपने अतीत के बारे में बताना।
रात के अंधेरे में अपनी बीमारी का सच साझा करना और फिर बाथरूम वाला वह सीन, जहां तकाको अचानक उन्हें गले लगा लेती है। वहां कोई बड़ी बात नहीं कही जाती, लेकिन शायद पूरे उपन्यास में वह सबसे मानवीय क्षण है।
फिर वह हिस्सा भी बहुत देर तक याद रहता है, जब मोमोको दोबारा चली जाती हैं और तकाको अपना वादा तोड़कर सातोरू को सारी सच्चाई बता देती है। उस समय तकाको का गुस्सा पूरी तरह जायज लगता है।
आखिर में मंदिर वाला सीन। जब सातोरू मोमोको को ढूंढ लेते हैं। जब वे सिर्फ इतना कहते हैं ‘मत जाओ। मुझे तुम्हारी जरूरत है।’ यहां पर लगता है कि सबसे कठिन भावनाएं सबसे सरल और छोटे वाक्यों में ही लिखी जा सकती हैं।

भाषा और लिखने का ढंग
इस किताब की भाषा की सबसे बड़ी खूबी उसकी सादगी है। लेखक कहीं भी प्रभावित करने की कोशिश नहीं करते हैं। वह बस कैरेक्टर्स के अनुरूप चल रही कहानी कहते हैं।
बहुत-सी किताबें पढ़ते समय लेखक की मौजूदगी महसूस होती रहती है। यहां ऐसा नहीं होता। यहां कैरेक्टर सामने रहते हैं और लेखक पीछे।
कहानी की गति भी धीमी है। कई बार ऐसा लगता है कि कुछ खास हो ही नहीं रहा। लेकिन बाद में एहसास होता है कि जीवन भी तो इसी तरह चलता है। थोड़ा-थोड़ा, धीरे-धीरे, बिना किसी घोषणा या शोर के।
लेखक भावनाओं को समझाती नहीं हैं। वे उन्हें घटित होने देती हैं। पाठक पर भरोसा करती हैं कि वह खुद महसूस कर लेगा।
यह किताब क्यों पढ़नी चाहिए?
यह किताब इसलिए पढ़नी चाहिए, क्योंकि यह हमें इंसानों के लिए थोड़ा और नरम बनाती है। हम अक्सर लोगों को उनके फैसलों से जज कर लेते हैं। लेकिन यह कहानी सिखाती है कि किसी फैसले के पीछे कितनी जटिल भावनाएं छिपी हो सकती हैं।
मोमोको को ही देख लीजिए। अगर हम सिर्फ उनके काम देखें, तो लगेगा कि उन्होंने सातोरू के साथ गलत किया। लेकिन जब हम उनकी पूरी कहानी जानते हैं, तो उनके लिए सहानुभूति पैदा होने लगती है।
यह किताब हमें याद दिलाती है कि किसी भी इंसान की कहानी हमेशा बाहर से दिखाई देने वाली कहानी से कहीं ज्यादा बड़ी होती है। शायद यही साहित्य का सबसे बड़ा काम भी है। ग्राफिक में देखिए ये किताब किसे पढ़नी चाहिए-

किताब के बारे में मेरी राय
मेरे लिए मोरीसाकी बुकशॉप के खुशनुमा दिन किताबों के बारे में लिखी गई कहानी से कहीं ज्यादा इंसानों के बारे में लिखी गई कहानी है। इसे पढ़ने के बाद मुझे किताब का प्लॉट नहीं, कैरेक्टर्स याद रहे।
सातोरू की दयालुता। मोमोको की बेचैनी। तकाको का धीरे-धीरे मजबूत होना। वादा का शांत और धैर्यपूर्ण स्वभाव और वह छोटी-सी बुकशॉप, जहां हर कोई किसी न किसी तरह खुद को खोज रहा है।
यह कोई ऐसी किताब नहीं है, जो आपको झकझोर दे। यह धीरे-धीरे आपके भीतर जगह बनाती है। और फिर आखिरी पन्ना खत्म होने के बाद भी वहीं बनी रहती है।
किताब बंद करने के बाद मेरे मन में बस यही विचार बचा रहा कि शायद जीवन की सबसे बड़ी खुशियां परफेक्ट होने में नहीं, बल्कि टूटने के बाद भी दोबारा जुड़ने में छिपी होती हैं।
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