Stubborn Child Parenting Tips; Crying Behavior

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7 मिनट पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल

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सवाल- मैं नई दिल्ली से हूं। मेरा बेटा 4 साल का है। जब वह पैदा हुआ तो हम चाइल्ड साइकोलॉजी की काफी किताबें पढ़ते थे। उसमें लिखा था कि बच्चों को बिल्कुल डांटना नहीं चाहिए। अभी वह चार साल का है और इन सालों में हमने कभी उसके सामने आवाज ऊंची नहीं की, उसे कभी डांटा नहीं। लेकिन अब वह काफी जिद्दी हो गया है। उसके मन का न हो तो रो-रोकर घर सिर पर उठा लेता है। हमें समझ नहीं आ रहा कि उसे कैसे हैंडल करें क्योंकि हम डांटना नहीं चाहते। प्लीज हमें गाइड करें।

एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर

जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। बच्चे को न डांटना एक समझदार पेरेंटिंग है। लेकिन यहां देखने वाली दो जरूरी बातें हैं-

  • बिना डांट-मार के बच्चे की परवरिश करना।
  • बिना बाउंड्री, डिसिप्लिन के बच्चे की परवरिश करना।

समझने वाली बात–

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बच्चे को डांटना, मारना नहीं है। लेकिन सही-गलत और डूज-डोंट्स का फर्क समझाना जरूरी है। इसे समझाने का तरीका क्या हो, यही समझने की जरूरत है।

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आपने अब तक बहुत धैर्य और समझदारी से पेरेंटिंग की है। लेकिन ‘कभी न डांटना’ और ‘कोई लिमिट न तय करना’ इन दोनों में फर्क होता है। बच्चे के मनोविज्ञान से जुड़ी कुछ बुनियादी बातें समझना जरूरी है। जैसेकि–

4 साल की उम्र में बच्चे-

  • अपनी इच्छाएं जताना और अपने जीवन पर कंट्रोल सीखते हैं।
  • वो अपनी इंडिपेंडेंस एक्सप्रेस करना चाहते हैं।
  • उन्हें सही-गलत का बोध नहीं होता।
  • वे इमोशंस को रेगुलेट करना नहीं जानते।
  • उनके लिए डूज और डोंट की कोई बाउंड्री नहीं होती।
  • वे जो भी करना या पाना चाहते हैं, उसकी कोशिश करते हैं।
  • अगर मन की मुराद पूरी न हो तो जिद करते, रोते हैं।
  • जो तरीका काम करता है, उसे बार-बार दोहराते हैं।
  • जैसे एक बार रोने पर खिलौना मिल गया तो हर बार कोई भी चीज लेने के लिए रोएंगे।

उनके दिमाग में ये मैसेज फीड हो जाता है-

“रोना = जीत”

इस सिचुएशन को पेरेंट्स कैसे हैंडल करते हैं?

वे दो तरीके अपनाते हैं-

  • बच्चे को डांटते हैं, डराते हैं या सजा देते हैं। कुछ पेरेंट्स हाथ भी उठा देते हैं।
  • कुछ पेरेंट्स, जो डांट, मार, सजा का रास्ता नहीं चुनना चाहते, वे पहले प्यार से समझाने की कोशिश करते हैं। जब बच्चा नहीं मानता, फिर उसकी जिद मान लेते हैं।

लेकिन हमें करना क्या चाहिए

  • डांटें नहीं, लेकिन स्पष्ट सीमा तय करें।
  • डूज और डोंट्स की क्लीयर बाउंड्री बनाएं।

कुछ उदाहरण:

बच्चा दूसरी टॉफी के लिए जिद कर रहा है। वो रो रहा है, पैर पटक रहा है। पूरा घर सिर पर उठा रखा है।

आप क्या करेंगे–

  • बच्चे को रोने दें।
  • जिद न मानें।
  • बीच में वो शांत हो तो उससे बात करें।
  • कहें- “बेटा, रोने, पैर पटकने से टॉफी नहीं मिलेगी। कब-कितनी मिलेगी, इस पर हम बात कर सकते हैं।”
  • बच्चे के साथ बैठकर, बात करके रूल बनाएं।
  • कहें- “दिन में दो टॉफी मिलेंगी। टाइम तुम खुद डिसाइड करो।”

गोल्डन रूल–

  • जिद से पिघलें नहीं।
  • स्ट्रिक्ट रहें।
  • प्यार से, शांति से लेकिन लॉजिक से बात करें।
  • अपने व्यवहार से बच्चे को ये मैसेज दें कि घर में रूल सबके लिए है।
  • रूल मम्मी-पापा के लिए भी है। मम्मी-पापा जिस काम के लिए बच्चे को मना करते हैं, वो काम खुद भी नहीं करते।

बच्चे की जिद की असल वजह समझें

बच्चों की जिद को पेरेंट्स सिर्फ बिहेवियरल प्रॉब्लम मान लेते हैं, जबकि इसके पीछे कई साइकोलॉजिकल, पेरेंटिंग और एनवायर्नमेंटल कारण छिपे होते हैं। अगर इन कारणों को सही तरीके से समझ लिया जाए, तो बच्चे के व्यवहार को संभालना आसान हो जाता है। नीचे दिए ग्राफिक से समझिए बच्चे आखिर जिद क्यों करते हैं-

समस्या ‘जिद‘ नहीं, ‘सिखाने का तरीका‘ है

4 साल की उम्र में बच्चा-

  • अपनी इच्छाएं एक्सप्रेस करना सीख रहा होता है।
  • ‘ना’ को स्वीकार करना नहीं जानता है।
  • इमोशंस (गुस्सा, निराशा) कंट्रोल नहीं कर पाता है।

इसलिए जब उसकी बात नहीं मानी जाती, तो वह रोकर, चिल्लाकर रिएक्ट करता है। इसका मतलब ये नहीं कि बच्चा बिगड़ गया है। इसका मतलब है कि उसे इमोशन मैनेज करना सिखाना बाकी है।

तो क्या बच्चे को डांटना सही है?

  • डांटना, चिल्लाना, डराना, शर्मिंदा करना गलत है। लेकिन हल्का, शांत और सीमाएं तय करने वाला टोन जरूरी है। जैसे-
  • “तुरंत चुप हो जाओ” कहने की बजाय बच्चे से कहें- “मुझे पता है तुम नाराज हो, लेकिन रोकर चीजें नहीं मिलतीं।”

इसमें फर्क सिर्फ ये है कि बच्चे को डांटना नहीं, गाइड करना है।

असली जरूरत: डिसिप्लिन की है, ना कि पनिशमेंट की

बहुत से पेरेंट्स इन दोनों को एक जैसा समझ लेते हैं। जबकि-

  • पनिशमेंट बच्चों में डर पैदा करती है।
  • डिसिप्लिन सही व्यवहार सिखाता है।

आपका लक्ष्य बच्चे को सही तरीका सिखाना होना चाहिए, न कि उसे डराना।

बच्चे की जिद को ऐसे करें हैंडल

जब बच्चा जिद करे तो पेरेंट्स का काम उसे डांटने-मारने या जिद पूरी करने की बजाय स्थिति को समझदारी से हैंडल करना है। अगर पेरेंट्स शांत रहकर कुछ आसान तरीके अपनाएं, तो बच्चे में धीरे-धीरे सुधार होगा। नीचे ग्राफिक से समझिए कि बच्चा जिद करे तो तुरंत क्या करना चाहिए-

बच्चे की परवरिश के गोल्डन रूल्स

जब हम प्यार, धैर्य और स्पष्ट नियमों के साथ बच्चे को गाइड करते हैं तो वह धीरे-धीरे सही व्यवहार सीखता है। नीचे दिए गए पेरेंटिंग के कुछ गोल्डन रूल्स हैं, जो बच्चे की जिद को सही तरीके से संभालने में मदद करेंगे।

बच्चे की जिद कम करने के लिए 7-दिन का एक्शन प्लान

सबसे पहले ध्यान रखें, यह कोई मैजिक नहीं है, लेकिन अगर लगातार इसे फॉलो करेंगे तो 7 दिन में फर्क दिखना शुरू हो जाएगा।

पहला दिन– ‘ऑब्जर्बेशन डे’

आज कुछ बदलना नहीं है, बस समझना है कि-

  • बच्चा कब जिद करता है?
  • किस चीज के लिए करता है?
  • आपकी कौन-सी प्रतिक्रिया उसे और बढ़ाती है?

इसे एक डायरी में नोट करें। इसका मकसद ट्रिगर को पहचानना है।

दूसरा दिन– कनेक्शन बनाएं

आज से कुछ एक्शनेबल काम शुरू करें।

  • रोज 20-30 मिनट साथ में समय बिताएं।
  • सिर्फ बच्चे के साथ खेलें।
  • कोई मोबाइल नहीं।
  • कोई सिखाना/डांटना नहीं।

फायदा

  • बच्चे की अटेंशन की जरूरत पूरी होगी।
  • जिद थोड़ी बहुत कम होगी।

तीसरा दिन– स्पष्ट नियम बनाएं

आज 2-3 छोटे नियम सेट करें। जैसेकि-

  • “दिन में 30 मिनट ही मोबाइल लेना है।”
  • “दिन में सिर्फ 1 ही चॉकलेट खाना है।”

बच्चे को नियम के फायदे-नुकसान बताएं। शांति से बात करें। ये नियम खुद भी फॉलो करें। उसे बताएं कि ये नियम नहीं बदलेंगे।

चौथा दिन– ‘नहीं मतलब नहीं’

आज असली टेस्ट है। जब बच्चा जिद करे-

  • शांत रहें।
  • एक बार समझाएं।
  • बार-बार रिपीट न करें।

अगर रोता है-

  • उसे रोने दें।
  • लेकिन जिद पूरी न करें।
  • यही सबसे बड़ा बदलाव लाएगा

पांचवां दिन– “पॉजिटिव रीइन्फोर्समेंट”

आज फोकस बदलें। गलत पर नहीं, सही पर ध्यान दें।

  • जब बच्चा बिना जिद किए बात माने।
  • व्यवहार में कुछ शांति दिखे।

तुरंत बोलें-

  • “मुझे बहुत अच्छा लगा, जब आपने ऐसे बोला।”
  • “आप तो बहुत शांत हो गए हो।”

इससे व्यवहार में पॉजिटिव बदलाव आएगा।

छठा दिन– ‘शांति सिखाएं’

आज बच्चे को शांत होना सिखाएं। इसे खेल की तरह सिखाएं। उससे कहें-

  • ”गहरी सांस लो, जैसे गुब्बारा फुला रहे हो।”
  • ”1-10 गिनकर सांस छोड़ो।”

इससे दिमांग शांत होगा।

सातवां दिन– “रियल प्रैक्टिस डे”

अब सबकुछ साथ में लागू करें। जब बच्चा जिद करे, उससे कहें-

  • कनेक्ट: “मुझे पता है तुम नाराज हो।”
  • लिमिट: “लेकिन ये अभी नहीं मिलेगा।”
  • ध्यान भटकाएं: “चलो ये करते हैं।”

सबसे जरूरी बात

  • शांत रहें। आपका टोन ही बच्चे का व्यवहार तय करता है।
  • अगर रोने के बाद मान गए तो जिद और बढ़ेगी।

नोट: पहले 2-3 दिन बच्चा और ज्यादा जिद करेगा, क्योंकि उसे लगेगा कि अब तक तो रोकर काम हो जाता था। लेकिन आप टिके रहे तो 4-5 दिन में बदलाव दिखेगा और 2-4 हफ्तों में काफी फर्क महसूस होगा।

5 लाइनें, जो आपको बिल्कुल नहीं बोलनी हैं-

  • “तुम बहुत जिद्दी हो।”
  • “चुप हो जाओ वरना…।”
  • “तुम अच्छे बच्चे नहीं हो।”
  • “देखो सब लोग क्या सोचेंगे।”
  • “अब मैं तुमसे बात नहीं करूंगा।”
  • ये लाइनें बच्चे के अंदर डर और गिल्ट बढ़ाती हैं।

अंत में यही कहूंगी कि बच्चों की जिद कोई बड़ी समस्या नहीं है। यह उनके विकास की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस समय उन्हें डांटने की बजाय धैर्य, समझदारी के साथ हैंडल करें। इससे वे धीरे-धीरे इससे बाहर निकल जाते हैं।

…………………..

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