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Sun, Oct 11, 2026Updated 12:19 PM IST
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सुपर अल नीनो का कहर: महज 20 दिन में चीनी 10% और दूध-आटा 6% महंगा, 2027 तक रह सकता है असर; गन्ने की फसल भी प्रभावित

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नई दिल्ली। मानसून को कमजोर करने वाले सुपर अल नीनो का दुष्प्रभाव अब देश में खाने-पीने की जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर साफ तौर पर दिखने लगा है। मौसम संबंधी इस वैश्विक घटनाक्रम के कारण भारत में खाद्य मुद्रास्फीति (फूड इन्फ्लेशन) तेजी से बढ़ रही है, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ रहा है। ताजा आंकड़ों और बाजार के रुझानों के अनुसार, महज 20 दिनों के भीतर चीनी की कीमतों में 10 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके अलावा दूध और आटे जैसे रोजमर्रा के उपयोग में आने वाले उत्पादों की कीमतों में भी 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। मौसम विभाग ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि यह संकट अल्पकालिक नहीं है और इसका प्रभाव वर्ष 2027 तक बना रह सकता है।

मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार, सुपर अल नीनो का प्रभाव आगामी दिसंबर महीने में अपने चरम पर होगा। विभाग का अनुमान है कि दिसंबर में चरम पर पहुंचने के बाद इसका असर अगली गर्मियों के आखिर तक बना रहेगा। इसका मतलब है कि सर्दियों से लेकर गर्मियों के अंत तक देश में मौसम का मिजाज सामान्य से भिन्न रहेगा, जिसका सीधा असर कृषि उत्पादन और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ेगा। लंबी अवधि तक बने रहने वाले इस मौसमी प्रभाव के कारण खाद्य वस्तुओं की कीमतों में स्थिरता आने की उम्मीद फिलहाल कम ही नजर आ रही है।

चीनी की कीमतों में आई तेजी का एक प्रमुख कारण गन्ने की फसल पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव है। स्रोत के अनुसार, सुपर अल नीनो के कारण गन्ने की फसल भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। गन्ना उत्पादन में कमी आने से चीनी मिलों को पर्याप्त कच्चा माल नहीं मिल पा रहा है, जिससे चीनी का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। जब उत्पादन घटता है और मांग बनी रहती है, तो बाजार में कीमतें स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती हैं। पिछले 20 दिनों में चीनी की कीमतों में 10 प्रतिशत की जो वृद्धि देखी गई है, वह इसी उत्पादन संकट का परिणाम है। यदि गन्ने की फसल में सुधार नहीं होता है, तो आने वाले समय में चीनी की कीमतों में और अधिक उछाल देखा जा सकता है।

केवल चीनी ही नहीं, बल्कि दूध और आटे की कीमतों में भी 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी ने आम जनता की चिंता बढ़ा दी है। दूध की कीमतों में वृद्धि के पीछे भी मौसम का बड़ा हाथ है। सुपर अल नीनो के कारण जब बारिश कम होती है और तापमान में अनियमितता आती है, तो पशुओं के लिए हरे चारे की कमी हो जाती है। चारे की कमी और भीषण गर्मी या बदलते मौसम के कारण पशुओं के दूध उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ता है। दूध की आपूर्ति कम होने से डेयरी कंपनियों को लागत बढ़ानी पड़ती है, जिसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर ही पड़ता है।

इसी प्रकार, आटे की कीमतों में 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी गेहूं की फसल और उसके उत्पादन से जुड़ी चुनौतियों को दर्शाती है। मानसून के कमजोर रहने और सुपर अल नीनो के प्रभाव से खेतों में नमी की कमी होती है, जिससे फसलों की पैदावार प्रभावित होती है। गेहूं की पैदावार में किसी भी तरह की गिरावट का सीधा असर आटे के खुदरा और थोक भाव पर पड़ता है। आटा और दूध दोनों ही भारतीय परिवारों की बुनियादी जरूरतों में शामिल हैं, इसलिए इनकी कीमतों में वृद्धि से खाद्य मुद्रास्फीति का सूचकांक तेजी से ऊपर जाता है।

सुपर अल नीनो एक ऐसी जलवायवीय घटना है जिसमें प्रशांत महासागर के पानी का तापमान सामान्य से काफी अधिक हो जाता है। यह वैश्विक मौसम पैटर्न को बदल देता है। भारत के संदर्भ में, अल नीनो का सीधा संबंध कमजोर मानसून से होता है। जब मानसून कमजोर होता है, तो देश के कई हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है या बारिश औसत से काफी कम रहती है। वर्तमान में सुपर अल नीनो का जो स्वरूप देखा जा रहा है, वह सामान्य अल नीनो से अधिक तीव्र है, और यही कारण है कि इसका प्रभाव कृषि और खाद्य कीमतों पर इतनी तेजी से और इतनी व्यापक रूप से दिखाई दे रहा है।

मौसम विभाग द्वारा 2027 तक प्रभाव बने रहने की जो संभावना व्यक्त की गई है, वह नीति निर्माताओं और सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। यदि यह अनुमान सटीक साबित होता है, तो आने वाले दो वर्षों तक देश में खाद्य सुरक्षा और कीमतों को नियंत्रित करना एक निरंतर प्रयास का विषय बना रहेगा। दिसंबर में चरम पर पहुंचने वाला यह प्रभाव अगली गर्मियों तक कैसे विकसित होता है, इस पर कृषि विशेषज्ञों और मौसम वैज्ञानिकों की करीबी नजर बनी हुई है।

वहीं, दूसरी ओर उपभोक्ताओं के लिए राहत की कोई तत्काल संभावना नजर नहीं आ रही है। चीनी, दूध और आटे जैसी आवश्यक वस्तुओं के महंगे होने से घरेलू बजट बिगड़ रहा है। गन्ने की फसल के प्रभावित होने से चीनी उद्योग भी दबाव में है। ऐसे में सरकार द्वारा बफर स्टॉक के प्रबंधन, आयात नीतियों में ढील और किसानों को मौसम की मार से बचाने के लिए उचित कदम उठाए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि, जब तक सुपर अल नीनो का मौसमी प्रभाव कम नहीं होता, तब तक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव और बढ़ोतरी का यह दौर जारी रहने की पूरी संभावना है।