सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में मेट्रो और इंटरनेट सेवाएं तुरंत बहाल करने के दिए आदेश, कहा- शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हिरासत में न लें

नई दिल्ली। वंदे भारत न्यूज़। देश की सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान लगाए गए प्रतिबंधों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए प्रशासन को महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि दिल्ली में मेट्रो सेवाओं को सामान्य रूप से चलाया जाना चाहिए, इंटरनेट सेवाओं को तत्काल बहाल किया जाए और आम नागरिकों की आवाजाही पर किसी भी प्रकार की रोक नहीं लगनी चाहिए। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी सख्त हिदायत दी है कि शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे लोगों को हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। यह फैसला उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया है, जिनमें दिल्ली में मेट्रो और इंटरनेट सेवाएं बंद किए जाने तथा भारी संख्या में लोगों की हिरासत को चुनौती दी गई थी।
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा आयोजित प्रदर्शन के मद्देनजर प्रशासन ने कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर कई सख्त कदम उठाए थे। इन कदमों के तहत राजधानी में 45 मेट्रो स्टेशनों को बंद कर दिया गया था, जिससे लाखों यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। मेट्रो दिल्ली की जीवन रेखा मानी जाती है और इतनी बड़ी संख्या में स्टेशनों के बंद होने से सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई थी। इसके अलावा, सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कई इलाकों में इंटरनेट सेवाओं को भी निलंबित कर दिया गया था, जिससे छात्रों, कारोबारियों और आम नागरिकों के दैनिक कार्यों पर गहरा असर पड़ा था।
प्रशासन की ओर से उठाए गए इन कदमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलीलों में कहा था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और इस अधिकार का उपयोग करने वालों के खिलाफ इस तरह की कठोर कार्रवाई संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है। याचिकाओं में बताया गया था कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रशासन ने लगभग 7000 लोगों को हिरासत में लिया था। इतनी बड़ी संख्या में लोगों की हिरासत को लेकर याचिकाकर्ताओं ने गहरी चिंता व्यक्त की और इसे नागरिकों की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी पहलुओं पर गहन विचार करने के बाद अपना रुख स्पष्ट किया। पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि मेट्रो सेवाएं एक आवश्यक सार्वजनिक सेवा हैं और इन्हें सामान्य रूप से चलना चाहिए। अदालत ने जोर देकर कहा कि कुछ लोगों के प्रदर्शन की वजह से पूरे शहर की परिवहन व्यवस्था को बाधित नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे उन करोड़ों नागरिकों को नुकसान होता है जिनका प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं है। इसी प्रकार, इंटरनेट सेवाओं की बहाली को लेकर भी कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए कि डिजिटल युग में इंटरनेट बंद करना लोगों के संचार और सूचना के अधिकार का हनन है, इसलिए इसे तुरंत बहाल किया जाना चाहिए।
अदालत ने लोगों की आवाजाही पर लगी रोक को भी अनुचित ठहराया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में नागरिकों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए और प्रशासन को इस स्वतंत्रता में बिना ठोस और वैध कारणों के हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि शीर्ष अदालत ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने के मामले पर सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं, उन्हें हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। यह निर्देश उन रिपोर्टों के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक माना जा रहा है, जिनमें 7000 लोगों को कस्टडी में लिए जाने की बात कही गई थी।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई अभी भी जारी है। अदालत ने प्रशासन से इन निर्देशों के अनुपालन की रिपोर्ट मांगी है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि प्रशासन ने कोर्ट के आदेशों के बाद कितने स्टेशन खोले हैं या इंटरनेट सेवाएं किस स्तर तक बहाल हुई हैं। साथ ही, हिरासत में लिए गए 7000 लोगों की रिहाई की प्रक्रिया और समयसीमा को लेकर भी अभी अनिश्चितता बनी हुई है। याचिकाकर्ताओं और प्रशासन दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद ही अदालत इस मामले में कोई अंतिम और विस्तृत आदेश पारित करेगी।
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के इस प्रदर्शन और उसके बाद प्रशासन द्वारा उठाए गए कदमों ने राष्ट्रीय राजधानी में कानून व्यवस्था, नागरिक अधिकारों और सार्वजनिक परिवहन को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। 45 मेट्रो स्टेशनों का बंद होना और 7000 लोगों का हिरासत में लिया जाना अपने आप में एक अभूतपूर्व स्थिति थी, जिसने न केवल दिल्ली बल्कि पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों के बाद अब यह देखना होगा कि दिल्ली प्रशासन और पुलिस इन आदेशों का कितनी तेजी से और किस रूप में पालन करती है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर आगे की सुनवाई जारी रहेगी और अदालत द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों के क्रियान्वयन पर नजर रखी जाएगी।

