दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) के हालिया चुनावी परिणामों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने तीन प्रमुख पदों पर जीत हासिल की है। जबकि उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन को 30 हजार से अधिक वोट मिले, जिससे पिछले 17 सालों में पहली बार DUSU के केंद्रीय पैनल में कोई निर्दलीय उम्मीदवार सफल हुआ। कांग्रेस के छात्र मोर्चा नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) को इस बार कोई भी पद हासिल नहीं करने में सफल होने में मिला।
परिणामों के अनुसार, ABVP के यश डबास अध्यक्ष पद पर विजयी रहे। इसके साथ ही रिया छावड़ी को सचिव पद और लक्ष्यराज सिंह को संयुक्त सचिव पद पर जीत मिली। इस तरह ABVP ने DUSU के तीनों केंद्रीय पदों में अपनी ताकत दर्ज कर ली है।
उपाध्यक्ष पद की लड़ाई में निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन को 30 हजार से ज्यादा वोट मिले, जिससे उन्होंने इस पद पर विजय प्राप्त की। यह जीत पिछले 17 सालों में DUSU के इतिहास में किसी निर्दलीय उम्मीदवार की पहली सफलता है। इससे पहले 2009 में निर्दलीय मनोज चौधरी और 1991 में निर्दलीय राजीव गोस्वामी क्रमशः DUSU अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर विजयी हुए थे।
दीपांशु शौकीन का परिवार दिल्ली के पीरागढ़ी क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। उनके पिता एक बस कंडक्टर हैं और माँ आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं। शौकीन ने भगत सिंह कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की है। जानकारी मिली है कि उनके पिता चाहते थे कि उन्हें UPSC की तैयारी कराई जाए, लेकिन शौकीन ने छात्र राजनीति में कदम रखने को प्राथमिकता दी।
इस DUSU चुनाव में शुक्रवार को 52 कॉलेजों में मतदान किया गया। कुल 1,51,519 पंजीकृत छात्रों में से 61,312 ने अपना मतदान प्रक्रिया पूरी की। इस प्रकार मतदान की दर 40.46% रही।
दिल्ली विश्वविद्यालय में दो प्रमुख कैंपस हैं — दक्षिण कैंपस और उत्तर कैंपस, जो लगभग 15 किमी की दूरी पर स्थित हैं। दोनों कैंपस मिलाकर DU में कुल 91 कॉलेज आते हैं, लेकिन DUSU के चुनावों में सभी कॉलेज सीधे मतदान प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पाते। DUSU के चुनावों में केवल 52 कॉलेज और फैकल्टी सीधे तौर पर वोटिंग में भाग लेते हैं। सेंट स्टीफंस, लेडी श्री राम और जीसस एंड मैरी जैसे कुछ प्रमुख कॉलेज DUSU का हिस्सा नहीं हैं।
NSUI के निराश कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस बार उनकी हार के कई कारक थे, जिनमें विभिन्न पहलुओं की भूमिका रही। हालांकि, NSUI ने इस चुनाव में कोई भी पद हासिल नहीं करने में सफल होने में मिला, जबकि ABVP ने तीनों पदों पर अपनी पक्षपाती ताकत दिखाई।
DUSU चुनाव परिणामों से यह संकेत मिलता है कि छात्र राजनीति में निर्दलीय विकल्प को भी मजबूत समर्थन मिल सकता है, विशेष रूप से जब उम्मीदवार अपनी व्यक्तिगत पहचान और कार्यकर्म से मतदाताओं का ध्यान आकर्षित कर पाते हैं। शौकीन की जीत इसी प्रवृत्ति का एक उदाहरण है, जिन्होंने अपने परिवार की प्रत्याशाओं के बावजूद छात्र राजनीति में अपना रास्ता चुना।














