जमुई के बाद समस्तीपुर में सड़क पर एक लड़की को खींचा गया, दबोचा गया और छेड़खानी की गई। इस घटना का वीडियो कैमरे में कैद हुआ और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। वीडियो के वायरल होने के बाद पूरे देश में इस पर तीखी प्रतिक्रिया देखी गई। घटना के बावजूद सत्ताधारी दल के कुछ मंत्री-नेताओं ने विवादित बयान दिए हैं। इन बयानों में घटना को छोटी बताने की कोशिश की गई और सरकार की छवि बचाने का प्रयास दिखा।
सत्ताधारी दल के नेताओं द्वारा दिए गए बयानों के पीछे दो प्रमुख कारण बताए गए हैं। पहला कारण सरकार की इमेज बचाना है। सोशल मीडिया पर घटना के वीडियो के तेजी से फैलने के बाद लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। सरकार के पास इस पर कोई त्वरित जवाब नहीं था। इस स्थिति में सत्ताधारी दलों के नेताओं और मंत्रियों ने घटना को कम महत्वपूर्ण बताकर अपनी छवि बचाने का प्रयास किया, लेकिन यह प्रयास उल्टा पड़ गया।
दूसरा कारण जंगलराज के नैरेटिव को कमजोर पड़ते देखना है। बिहार में नवंबर 2005 से NDA की सरकार है। जब भी सरकार कानून व्यवस्था के मुद्दे पर घिरती है, तो जंगलराज की याद दिलाने की कोशिश की जाती है। एक चुनावी रणनीतिकार के अनुसार, बीजेपी-जेडीयू अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए कथित जंगलराज का सहारा लेती है। लेकिन इस बार जंगलराज वाला नैरेटिव कमजोर पड़ गया है। लोगों ने सोशल मीडिया पर सरकार को सीधे निशाने पर लिया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का एक बयान भी वायरल हुआ है। इस स्थिति में सरकार में शामिल पार्टियों को उचित प्रतिक्रिया देने में असमझ की स्थिति पैदा हो गई है, जिसके परिणामस्वरूप अनाप-शनाप बयान दिए जा रहे हैं। इस मामले का प्रभाव पटना तक सीमित नहीं रहा, यह दिल्ली तक पहुंच गया।
घटना को रोकने के तीन मुख्य उपाय सुझाए गए हैं। पहला उपाय नीतीश कुमार के स्पीडी ट्रायल मॉडल पर वापस लौटना है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को फास्ट ट्रैक कोर्ट की अवधारणा को शीघ्र अपनाना होगा। यह मॉडल बिहार में कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने का एक आजमाया हुआ फॉर्मूला माना जाता है। 2005 में नीतीश कुमार ने इसी मॉडल के माध्यम से राज्य से कथित जंगलराज को समाप्त करने का प्रयास किया था। एक तिहाई से भी कम फास्ट ट्रैक कोर्ट अब काम कर रहे हैं। PIB की 30 अप्रैल 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में केवल 54 फास्ट ट्रैक कोर्ट काम कर रहे हैं, जिनमें से 48 में विशेष रूप से पॉक्सो एक्ट से जुड़े मामलों की सुनवाई होती है। हाल ही में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 100 नए फास्ट ट्रैक कोर्ट खोलने की घोषणा की है।
दूसरा उपाय उत्तर प्रदेश, तेलंगाना और केरल के मॉडल को अपनाना है। तेलंगाना की सी-टीम (SHE Teams), उत्तर प्रदेश की मिशन शक्ति और केरल की पिंक पेट्रोल को महिलाओं की सुरक्षा के लिए प्रभावी मॉडल माना जाता है। बिहार पुलिस इन राज्यों से सीख ले सकती है: तेलंगाना से रोकथाम, उत्तर प्रदेश से पूछताछ और केरल से दृश्यमान पुलिसिंग के तरीके को अपना सकती है। इसके लिए बिहार पुलिस को सात specific सुझाव दिए गए हैं: (1) हर जिले में ‘विमेन एंड चाइल्ड सेफ्टी टीम’ की स्थापना, (2) स्कूल-कॉलेज के आसपास हॉटस्पॉट पुलिसिंग के लिए हर थाने को अपने क्षेत्र के 10–20 स्थान चिह्नित करने चाहिए जहां सादे कपड़े में सिपाही रहें और महिला पुलिस समय-समय पर पेट्रोलिंग करें, (3) हर थाने में महिला हेल्प डेस्क को केवल ‘डेस्क’ नहीं रखना चाहिए, उसे तीन शक्तियां मिलनी चाहिए ताकि पीड़िता को पता रहे कि उसकी शिकायत किस अधिकारी के पास है और अगली कार्रवाई कब होगी, (4) साइबर और मिसिंग चाइल्ड को एक साथ जोड़ना चाहिए, नाबालिग के गायब होने के मामलों में प्रारंभिक जांच में साइबर थाने को स्थानीय थानों के साथ रैपिड रिस्पांस प्रोटोकॉल दिया जाना चाहिए, (5) बार-बार अपराध करने वालों का अलग रजिस्टर बनाना चाहिए ताकि छेड़खानी, स्टाकिंग, महिलाओं को धमकाने और नाबालिगों को टारगेट करने वाले मामलों में दोहराव वाले अपराधियों की निगरानी की जा सके, (6) स्कूलों में ‘सेफ रिपोर्टिंग’ सिस्टम लागू करना चाहिए, हर स्कूल/कॉलेज में एक प्रशिक्षित महिला नोडल अधिकारी होना चाहिए ताकि बच्ची सीधे बता सके कि उसे किससे खतरा है, हर शिकायत को FIR में बदलना आवश्यक नहीं है लेकिन हर विश्वसनीय जोखिम का मूल्यांकन और उचित रेफरल होना चाहिए, (7) हर गंभीर घटना के बाद ‘पुलिस फेलियर रिपोर्ट’ तैयार करनी चाहिए, नाबालिग के साथ गंभीर अपराध होने के बाद केवल आरोपी की गिरफ्तारी की समीक्षा नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह पूछा जाना चाहिए कि क्या इसे घटना से पहले रोका जा सकता था और जांच होनी चाहिए।
तीसरा उपाय समाज और परिवार को आगे लाना है। मगध महिला कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर निधि सिंह और पटना हाईकोर्ट की एडवोकेट स्मृति तिवारी के अनुसार, इस तरह की घटना लिंग आधारित हिंसा है और इसका संबंध यौन हिंसा से है। जब व्यक्ति अंदर से आक्रामक होता है और दूसरों की इच्छाओं का सम्मान नहीं करता है, तो यह हिंसात्मक व्यवहार के रूप में सामने आता है। इसके पीछे कई कारण हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यौन अपराध केवल क्षणिक आवेश या शारीरिक भूख का परिणाम नहीं होते, बल्कि इसके पीछे एक गहरी विकृत मानसिकता और सामाजिक-मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं। इनमें पहला कारण ओटीटी और पोर्नोग्राफी का प्रभाव है। डिजिटल क्रांति ने वयस्क सामग्री तक पहुंच को बहुत आसान बना दिया है, जिसका युवाओं के कोमल मन पर घातक प्रभाव पड़ रहा है। पोर्नोग्राफी अक्सर सहमति और सम्मान को दरकिनार कर देती है, जिससे युवाओं में यह गलत धारणा बनती है कि हिंसा या जबरदस्ती भी यौन व्यवहार का हिस्सा है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और वेब सीरीज में अक्सर महिलाओं को केवल ग्लैमर और शारीरिक आकर्षण के केंद्र के रूप में दिखाया जाता है। जब महिलाएं वस्तु के रूप में देखी जाने लगती हैं तो उनके प्रति संवेदनशीलता खत्म हो जाती है। हिंसक यौन दृश्यों को मर्दानगी से जोड़कर पेश करना युवाओं को यह सिखा रहा है कि शक्ति का प्रदर्शन ही यौन सुख है। दूसरा कारण युवाओं में बढ़ता नशा का प्रभाव है, जो इस प्रकार की घटनाओं में योगदान दे सकता है।
इन बिंदुओं के आधार पर स्पष्ट है कि घटना की गंभीरता को स्वीकार करते हुए त्वरित और प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है। सरकार, पुलिस, सामाजिक संगठनों और परिवारों को मिलकर काम करना होगा ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।


















