नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने शराबबंदी की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल उठाते हुए स्पष्ट किया है कि जबरन शराबबंदी न तो शराब की लत का समाधान है और न ही जहरीली शराब से होने वाली मौतों को रोकने का कारगर उपाय। जस्टिस जेबी पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने 18 सितंबर को महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स, 1972 के नियम 18ए और 18बी को रद्द करने के फैसले के दौरान यह विस्तृत टिप्पणी की। कोर्ट ने अपने निर्णय में गुजरात के दशकों पुराने शराबबंदी अनुभव को आधार बनाते हुए कहा कि 1960 से सख्त शराबबंदी लागू होने के बावजूद मेथनॉल युक्त जहरीली शराब से मौतों का सिलसिला थमा नहीं है।
पीठ ने रिकॉर्ड पर लिया कि गुजरात में पिछले दशकों में मेथनॉल मिली शराब के 10 बड़े हादसों में 600 से अधिक लोगों की जान गई है। हाल की घटनाओं का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि भावनगर (गुजरात) और सागर (मध्य प्रदेश) में हुई जहरीली शराब त्रासदियों में क्रमशः लगभग 13 और 15 लोगों की मौत हुई। कोर्ट ने कहा, “ये घटनाएं अधिकारियों को फिर से जागने और कार्रवाई करने की याद दिलाती हैं।”
फैसले में शराबबंदी से जुड़े पांच प्रमुख “नुकसान” सूचीबद्ध किए गए। पहला, शराब पर लगने वाले कर से होने वाले राजस्व का नुकसान। दूसरा, शराबबंदी लागू करने में होने वाला भारी खर्च और अच्छे-खासे पैसे का इस्तेमाल। तीसरा, पुलिस और आबकारी विभाग में भ्रष्टाचार को बढ़ावा। चौथा, अवैध शराब बनाने का धंधा फलना-फूलना। पांचवां, इससे पैदा होने वाले नशीले पदार्थों का खतरा। कोर्ट ने कहा कि शराब पर पूरी तरह रोक लगाने से कारोबार भूमिगत हो जाता है, जिससे बिना किसी नियंत्रण के जहरीली शराब का चलन और बढ़ जाता है।
मामले की पृष्ठभूमि में महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स के नियम 18ए और 18बी को चुनौती देने वाली याचिका थी। इन नियमों के तहत मेथनॉल खरीदने पर रोक लगाई गई थी और गैर-दवा निर्माताओं को मेथनॉल बेचने से पहले उसमें कड़वा पदार्थ और रंग मिलाना अनिवार्य किया गया था। ये नियम 1991 में मुंबई के एक छाया बार से खरीदी गई नकली शराब पीने के बाद 250 लोगों के प्रभावित होने और उनमें से 93 की मौत के बाद लागू किए गए थे। जांच में पता चला कि पीड़ितों ने मेथनॉल का सेवन किया था।
कोर्ट ने इन नियमों को असंवैधानिक और मनमाना करार देते हुए कहा कि इनसे उद्योगों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। पीठ के अनुसार, ये नियम उन मूल समस्याओं का समाधान नहीं करते जिनसे जहरीली शराब की घटनाएं होती हैं। इन मूल समस्याओं में मेथनॉल की चोरी, उसका गलत जगह पहुंचना (डायवर्जन) और संस्थागत भ्रष्टाचार शामिल हैं।
अवैध शराब की सप्लाई रोकने के लिए बेंच ने कई निर्देश जारी किए। कोर्ट ने शराब की सप्लाई और मांग की कड़ी तोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। अंतरराज्यीय सीमाओं पर निगरानी बढ़ाने को कहा ताकि अवैध तरीके से शराब ले जाने पर रोक लगे। पीठ ने यह भी संज्ञान लिया कि नगर निगम के कई स्कूल परिसर खुले मैदान होते हैं जिनका इस्तेमाल अक्सर अवैध शराब रखने के लिए किया जाता है। सरकारों को केमिकल सॉल्वेंट बनाने वाली औद्योगिक इकाइयों की निगरानी की सलाह दी गई क्योंकि ऐसी इकाइयां इन सॉल्वेंट को अवैध रूप से शराब बनाने वालों को बेचती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मेथनॉल की ढुलाई के लिए अलग टैंकरों या कंटेनरों के इस्तेमाल का निर्देश दिया ताकि मेथनॉल की चोरी या उसकी जगह दूसरा पदार्थ भरने की संभावना खत्म हो। कोर्ट ने कहा कि मेथनॉल जहर से कम खतरनाक नहीं होता और इसकी आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करना आवश्यक है।
यह फैसला शराबबंदी नीति पर एक महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी है जो न केवल कानूनी पहलुओं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, प्रशासनिक विफलताओं और सामाजिक-आर्थिक प्रभावों को भी रेखांकित करता है। कोर्ट का मानना है कि निषेधात्मक नीतियों के बजाय नियामक तंत्र को मजबूत करना, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना और औद्योगिक रसायनों के डायवर्जन को रोकना अधिक प्रभावी होगा।


















