16 मई की रात ओडिशा में रहने वाले गणेश के पास छोटे भाई रमैया का फोन आया। बताया कि घर खर्च के लिए 22 हजार रुपए भेज रहा है। डेढ़ महीने पहले ही रमैया कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने के लिए रूस गया था। मां से भी बात हुई। कहा नाइट ड्यूटी पर है और खाना खाकर सा
.
अगले दिन सुबह दोबारा कॉल आया। अबकी फोन रमैया के रूम पार्टनर देवेंद्र का था। उसने बताया कि सुबह करीब 5 बजे कंपनी साइट पर यूक्रेन ने कई ड्रोन हमले किए। रमैया भी साइट पर था और हमले का शिकार हो गया। दोपहर होते-होते उसकी मौत की खबर आ गई।
घटना को 10 दिन से ज्यादा बीत चुके हैं, रमैया का अंतिम संस्कार भी कर दिया गया, लेकिन गंजाम में रह रहा उनका परिवार अभी सदमे से उबर नहीं सका है। परिवार परेशान है कि रमैया के जाने के बाद बहनों की शादी के लिए लिया 30 लाख का कर्ज कौन उतारेगा। रमैया के साथ हमले में ओडिशा के दो और युवक घायल हुए हैं। दोनों का मॉस्को में इलाज चल रहा है।

घटना के 4 दिन बाद 21 मई को रमैया की डेडबॉडी भारत लाई जा सकी और उसका अंतिम संस्कार किया गया।
हर महीने 35 हजार रुपए घर भेजता, अब परिवार बेसहारा
रमैया मास्को में तुर्की की ऑयल और गैस कंपनी में स्टील इरेक्टर के तौर पर काम कर रहे थे। उनके परिवार से मिलने के लिए हम गंजाम के माधबांधा गांव पहुंचे। घर पर मिले रमैया के बड़े भाई गणेश बताते हैं, ‘परिवार में माता-पिता और भाई-बहन सभी दिहाड़ी मजदूर हैं। इसी से घर का खर्च चलता है। बहनों की शादी में लिया कर्ज चुकाने के लिए रमैया रूस गया था।‘
‘वो करीब एक साल से मास्को में कंस्ट्रक्शन सेक्टर में इलेक्ट्रिकल लाइन और स्ट्रक्चरल काम कर रहा था। इसी साल फरवरी में छुट्टी लेकर गांव लौटा था और फिर 22 मार्च को मॉस्को लौट गया था। रमैया हर महीने करीब 42 हजार रुपए की कमाई से 35 हजार घर भेज देता था। मौत से एक दिन पहले जब उससे बात हुई थी, तब भी वो परिवार की ही फिक्र में था।‘

गणेश कहते हैं कि मौत की खबर पर पहले तो यकीन नहीं हुआ। जब मायकोन एजेंसी ने मौत की बात कंफर्म की तो हमारी उम्मीदें ही टूट गईं।
मां बोली- हम भूखों रहने को मजबूर, अब कौन संभालेगा
रमैया की मां रोते हुए कहती हैं ‘वो हमारे परिवार का सबसे बड़ा सहारा था। हम सब मजदूरी करके रोज मुश्किल से 200 से 500 रुपए कमा पाते हैं। कई दिन ऐसे भी होते हैं, जब काम नहीं मिलता और परिवार को भूखे सोना पड़ता है। अब कौन हमें सहारा देगा।‘
परिवार वालों ने बताया कि इस बार रमैया गांव लौटकर अपना छोटा-मोटा काम शुरू करना चाहता था। उसने शादी करने की भी तैयारी की थी।

मां ने बताया कि रमैया कहता था कि अब माता-पिता को मजदूरी नहीं करने देगा, लेकिन उससे पहले ही हादसा हो गया।
रमैया के चाचा नारायण दिल्ली में मजदूरी करते हैं। वे कहते हैं, ‘गरीबी और काम न मिलने की वजह से गांव के लड़के काम के लिए बाहर जाने को मजबूर हैं। हमारा रमैया भी इसीलिए बाहर गया, वरना कोई जान जोखिम में डालकर रूस क्यों जाता। अब उसके बूढ़े मां-बाप की देखभाल कौन करेगा।‘

मॉस्को में मौत से लड़ रहे ओडिशा के दो और मजदूर
मॉस्को में रमैया के साथ ही ओडिशा के खेतराबासी रेड्डी और तेजेश्वर रेड्डी भी हमले का शिकार हुए हैं। दोनों अभी मॉस्को के अस्पताल में भर्ती हैं। उनके परिवारों से मिलने हम गंजाम के कोथारसिंग गांव पहुंचे।
खेतराबासी के घर पर उनकी पत्नी मिलीं। उन्होंने बताया, ’गर्दन और चेहरे पर गंभीर चोटें आई हैं। परिवार के पास उन्हें भारत लाकर इलाज कराने के पैसे नहीं हैं, इसलिए वो मॉस्को में ही हैं। कंपनी उनका इलाज करा रही है।’
उन्होंने खेतराबासी से हमारी फोन पर बात भी कराई। वे बताते हैं कि 17 मई को कुल 7 ड्रोन हमले हुए थे और करीब 15 लोग इसकी जद में आए। हमले में अकेले रमैया की ही मौत नहीं हुई, अजरबैजान का एक मजदूर भी मारा गया था। इसके अलावा गोपालपुर के रहने वाले सुनील, पारलाकहेमुंडी के चिनारा और दासरथी के साथ बेनीपुर के दुर्योधन भी घायल हुए हैं।

मॉस्को के अस्पताल में भर्ती खेतराबासी रेड्डी वीडियो कॉल पर परिवार से बात करते हुए।
इसके बाद तेजेश्वर रेड्डी के घर हमें उनकी मां मिलीं। उन्होंने बताया, ‘घटना के दिन दोपहर 3 बजे हमें खबर मिली। बेटे का चेहरा और हाथ-पैर सब जख्मी है।’ हमने जब पूछा कि आपके बेटे से कोई बात हुई। वे जवाब में कहती हैं, ‘वो अभी बात नहीं कर पा रहा है। सिर्फ वीडियो कॉल पर हमें देखता है।’ उन्होंने वीडियो कॉल कर हमें तेजेश्वर की हालत भी दिखाई।

गंजाम के कोथारसिंग गांव के रहने वाले तेजेश्वर रेड्डी भी ड्रोन हमले में घायल हुए हैं और मॉस्को में उनका इलाज चल रहा है।
66 लाख रुपए कंपनसेशन तय, परिवार बोला- अभी नहीं मिला
रूस में इस वक्त करीब 70 हजार भारतीय काम कर रहे हैं। वहीं ओडिशा के गंजाम और केंद्रापाड़ा जिलों से सबसे ज्यादा युवा रूस में काम कर रहे हैं। गंजाम से हर साल करीब 200 और केंद्रपाड़ा से 150 युवक लोकल एजेंसियों के जरिए रूस जा रहे हैं।
रमैया को रूस भेजने वाली मायकोन इंजीनियरिंग ट्रेनिंग एंड टेस्टिंग सेंटर के मालिक बासुदेव रेड्डी बताते हैं कि हमारी एजेंसी स्किल डेवलपमेंट और रिक्रूटमेंट का काम करती है। वे कहते हैं, ‘हादसे की जानकारी मिलते ही हमने मॉस्को में मौजूद कंपनी के अधिकारियों से बात की। फिर ओडिशा सरकार की मदद से डेडबॉडी भारत लाकर परिवार को सौंपी।‘
‘इसी दौरान हमने रमैया के परिवार की कंपनी डायरेक्टर से बात कराके मुआवजे की रकम भी तय कराई। कंपनी ने 66 लाख रुपए कंपनसेशन देने की बात कही है।‘ हालांकि रमैया के परिवार का कहना है कि अब तक पूरा मुआवजा नहीं मिला है। डेथ सर्टिफिकेट और बाकी जरूरी दस्तावेजों की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हुई है।

रमैया के परिवार ने प्रधानमंत्री कार्यालय से मदद के लिए संपर्क किया, लेकिन वहां से कोई ठोस जवाब नहीं मिला है।
5 सालों में विदेश में 37,740 भारतीय मजदूरों की मौत
भारत से हर साल करीब 6 से 8 लाख लोग इमिग्रेशन चेक रिक्वायर्ड (ECR) कैटेगरी के तहत विदेश काम करने जाते हैं। इसमें बड़ी संख्या दिहाड़ी मजदूरों, कंस्ट्रक्शन वर्कर, ड्राइवर, वेल्डर, इलेक्ट्रिशियन और घरेलू कामगारों की होती है। 2021 से 2025 के बीच विदेश काम करने गए 37,740 भारतीय मजदूरों की मौत दर्ज की गई। अगर इसका औसत आंकड़ा देखें तो हर दिन 20 से ज्यादा भारतीय कामगार विदेश में जान गंवा रहे हैं।
सिर्फ 2025 के आंकड़े देखें तो विदेश में काम करने गए 7,854 भारतीय मजदूरों की मौत हुई। इनमें 86% से ज्यादा मौतें खाड़ी देश यूएई और सऊदी अरब में दर्ज की गईं। वहीं केंद्र सरकार ने पिछले एक साल में रूस में 26 भारतीयों की मौत की पुष्टि की है।
………………………
ओडिशा की ये खबर भी पढ़ें…
19 हजार के लिए कंकाल निकाला, अब मिले 15 लाख

जीतू मुंडा, उम्र 52 साल। बदन पर सिर्फ एक कपड़ा। कंधे पर बड़ी बहन कलरा का कंकाल। कलरा के बैंक अकाउंट में 19,400 रुपए जमा थे। उनकी मौत के बाद जीतू 27 अप्रैल को पैसे निकालने बैंक पहुंचे। आरोप है कि बैंक मैनेजर ने कहा कि बहन को लाओ, तभी पैसे मिलेंगे। जीतू ने कब्र से बहन का कंकाल निकाला और तीन किमी दूर बैंक लेकर आ गए। मामला ओडिशा के क्योंझर जिले के दियानाली गांव का है। पढ़िए पूरी खबर…















