पश्चिम बंगाल के रेजीनगर उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी ने शनिवार को एक असाधारण मोड़ का साक्षात्कार किया। उन्होंने सुबह करीब 10 बजे अपनी उम्मीदवारी वापस लेने की घोषणा की, लेकिन करीब एक बजे ममता बनर्जी से बातचीत के बाद अपना फैसला पलट लिया और कहा कि वे चुनाव लड़ेंगे।
रबीउल आलम चौधरी ने सुबह अपने समर्थकों से बातचीत करते हुए कहा कि उन्हें पुराना चुनाव चिह्न अर्थात जोड़ा घास फूल नहीं मिला है। उन्होंने आगे बताया कि कम समय में नए चुनाव चिन्ह ‘फुटबॉल प्लेयर’ को मतदाताओं तक पहुंचाना अत्यंत कठिन है। इसके अलावा, उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को परेशान किए जाने का भी आरोप लगाया।
हालांकि, दोपहर के करीब एक बजे रबीउल ने एक बार फिर अपनी बात बदल दी। उनके अनुसार, ममता बनर्जी के साथ हुई बातचीत के बाद उन्होंने अपना निर्णय बदल लिया है और वे अब चुनाव लड़ने को तैयार हैं। इस घटना ने रेजीनगर उपचुनाव में नई उतार-चढ़ाव पैदा कर दी है।
इससे एक दिन पहले शुक्रवार को नंदीग्राम सीट पर भी ममता गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने अपना नामांकन वापस ले लिया था। इसके बाद ममता बनर्जी ने नंदीग्राम से कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने का ऐलान किया। हालांकि, इसके कुछ घंटे बाद मिलन प्रधान को 2007 के एक पुराने हत्या मामले में गिरफ्तार कर लिया गया, जिससे नंदीग्राम की राजनीतिक स्थिति और भी जटिल हो गई।
रेजीनगर और नंदीग्राम सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होगा और 9 अक्टूबर को मतगणना होगी। रेजीनगर सीट हुमायूं कबीर के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी, जबकि नंदीग्राम सीट शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे के बाद रिक्त हुई थी।
दोनों सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए TMC के दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न मिले हैं। ममता गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल प्लेयर’ सिंबल आवंटित किया गया है, जबकि अरूप रॉय गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ सिंबल दिया गया है।
चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को दोनों TMC गुटों को मूल नाम और चुनाव चिन्ह इस्तेमाल करने से रोकते हुए अलग-अलग नाम और सिंबल दिए थे। इसके बाद ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उन्होंने शुक्रवार को अपनी याचिका में चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी को पक्षकार बनाया है।
TMC के नाम और सिंबल को लेकर विवाद मई के विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद शुरू हुआ। जून में 58 बागी विधायकों ने ममता खेमे के उम्मीदवार शोभनदेव चट्टोपाध्याय की जगह निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता चुना और स्पीकर ने भी उन्हें मान्यता दे दी। इसके बाद पार्टी में 28 साल में पहली बार टूट हो गई।
विवाद बाद में संसद तक पहुंचा। 20 लोकसभा सांसदों ने काकली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में अलग ग्रुप के रूप में खुद को पेश किया और BJP के नेतृत्व वाले NDA का समर्थन किया। इसके बाद दोनों गुटों ने TMC के नाम और ‘जोड़ा घास फूल’ चुनाव चिन्ह पर दावा किया।
नंदीग्राम सीट लंबे समय से TMC और भाजपा के बीच राजनीतिक संघर्ष का प्रमुख केंद्र रही है। इस क्षेत्र में 2007 के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने ममता बनर्जी और TMC को 2011 में सत्ता तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। 2021 में ममता ने यहीं से बंगाल के मौजूदा सीएम शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन हार गईं।
अधिकारी BJP में शामिल होने के बाद TMC के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी बन चुके हैं। 2026 के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम के साथ भवानीपुर सीट से भी चुनाव लड़ा और दोनों जगह जीत दर्ज की। भवानीपुर में उन्होंने ममता बनर्जी को 15,105 वोटों से हराया। अधिकारी को 73,917 वोट मिले, जबकि ममता बनर्जी को 58,812 वोट मिले। बाद में अधिकारी ने भवानीपुर सीट अपने पास रखी और नंदीग्राम से इस्तीफा दे दिया।
नाम वापसी की औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद रिटर्निंग ऑफिसर अंतिम उम्मीदवारों की सूची जारी करेंगे। एक बार नाम वापसी वैध तरीके से हो जाने के बाद उसी चुनाव में उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी दोबारा बहाल नहीं कर सकता। नाम वापसी की समय-सीमा खत्म होने के बाद उसी चुनाव में नया नामांकन दाखिल करने का मौका नहीं मिलता। यदि नाम वापसी के बाद सिर्फ एक उम्मीदवार बचता है तो चुनाव निर्विरोध हो सकता है और रिटर्निंग ऑफिसर उस उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित कर सकता है।
किसी उम्मीदवार की गिरफ्तारी से उसकी उम्मीदवारी स्वतः खत्म नहीं होती। इसके लिए संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत अयोग्यता की स्थिति बनना जरूरी है। यदि उम्मीदवार कानूनी रूप से चुनाव लड़ने के लिए योग्य है और उसकी उम्मीदवारी वैध है, तो केवल गिरफ्तारी के आधार पर उसका नाम बैलेट से हटाना जरूरी नहीं होता। उम्मीदवार जेल में होने की स्थिति में वह खुद प्रचार, जनसभा या मतदाताओं से सीधे संपर्क में शामिल नहीं हो पाएगा, हालांकि उसकी उम्मीदवारी अलग से बनी रह सकती है।













