नई दिल्ली: पूर्व उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने गुरुवार को तीसरे एजी नूरानी मेमोरियल लेक्चर में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के एक ऐतिहासिक बयान को उद्धृत करते हुए कहा कि भारत के समक्ष वास्तविक खतरा कम्युनिज्म से नहीं, बल्कि हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता से था। यह कार्यक्रम प्रख्यात विधिवेत्ता और संवैधानिक विशेषज्ञ अब्दुल गफूर नूरानी के जीवन और कृतित्व को समर्पित था, जिसका आयोजन नई दिल्ली स्थित इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में किया गया था।
कार्यक्रम का शीर्षक ‘रिमेंबरिंग अ पॉलीमैथ: द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ अब्दुल गफूर नूरानी’ रखा गया था। इस अवसर पर पूर्व उपराष्ट्रपति अंसारी ने नूरानी की वर्ष 2019 में प्रकाशित चर्चित पुस्तक ‘द RSS: अ मेनेस टू इंडिया’ का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने इस पुस्तक को आकार और सामग्री, दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह संभवतः नूरानी की अंतिम बड़ी कृति थी।
अंसारी ने अपने संबोधन में बताया कि नूरानी ने पुस्तक की भूमिका में दो उर्दू शेरों के माध्यम से अपने विचारों को अभिव्यक्त किया था। पूर्व उपराष्ट्रपति के अनुसार, नूरानी ने इस पुस्तक में अपने वैचारिक उद्देश्य को छिपाने का कोई प्रयास नहीं किया। अंसारी ने पुस्तक की भूमिका में नूरानी की उस टिप्पणी का भी जिक्र किया जिसमें उन्होंने इसे भारत के मुसलमानों के बीच मौजूदा भावना का प्रतिबिंब बताया था।
नेहरू के ऐतिहासिक बयान का हवाला देते हुए अंसारी ने पूर्व विदेश सचिव जगत सिंह गुंडेविया के दस्तावेजों का संदर्भ दिया। यह बयान विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की एक आंतरिक बैठक से संबंधित था। अंसारी ने उद्धृत किया, “नेहरू ने चेतावनी दी थी कि भारत को असली खतरा कम्युनिज्म से नहीं, बल्कि हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता से था।” इस बयान के माध्यम से अंसारी ने समकालीन राजनीतिक विमर्श में नेहरू की दूरदर्शिता को रेखांकित करने का प्रयास किया।
नागरिक राष्ट्रवाद से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर बढ़ते रुझानों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए पूर्व उपराष्ट्रपति ने कहा कि हाल के वर्षों में ऐसे रुझान और तौर-तरीके उभरे हैं जो नागरिक राष्ट्रवाद के स्थापित सिद्धांत को सीधी चुनौती देते हैं। उन्होंने कहा कि इनकी स्थान पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एक नई और काल्पनिक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।
अंसारी ने विस्तार से बताया, “यह प्रवृत्ति चुनावी बहुमत को धार्मिक बहुमत के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है और राजनीतिक सत्ता पर एकाधिकार कायम करना चाहती है। यह आस्था के आधार पर नागरिकों में भेदभाव करना चाहती है। यह असहिष्णुता को बढ़ावा देती है, दूसरों को ‘अन्य’ के रूप में चिह्नित करती है और समाज में बेचैनी तथा असुरक्षा की भावना पैदा करती है।”
पूर्व उपराष्ट्रपति ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि इसके हालिया कुछ रूप बेहद डराने वाले हैं। ये घटनाक्रम कानून के शासन के तहत चलने के भारत के संवैधानिक दावे पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा, “यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब देना अनिवार्य है। इन रुझानों का विरोध करना आवश्यक है। इनका विरोध कानूनी और राजनीतिक, दोनों ही स्तरों पर किया जाना चाहिए।”
अब्दुल गफूर नूरानी के बहुआयामी योगदान को याद करते हुए अंसारी ने उन्हें एक प्रतिष्ठित लेखक, संवैधानिक विशेषज्ञ और राजनीतिक टिप्पणीकार के रूप में वर्णित किया। नूरानी ने संवैधानिक मामलों, इतिहास और राजनीति पर अनेक प्रामाणिक पुस्तकों की रचना की। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यक अधिकारों और शासन से जुड़े जटिल मुद्दों पर भी विस्तृत और विद्वतापूर्ण लेखन किया।
इस स्मृति व्याख्यान में बुद्धिजीवियों, विधिवेत्ताओं, पत्रकारों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम में नूरानी के विधिक चिंतन और संवैधानिक मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर विस्तृत चर्चा हुई। वक्ताओं ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि नूरानी का लेखन समकालीन भारत के लिए एक महत्वपूर्ण बौद्धिक विरासत है जिसका अध्ययन और अनुशीलन आवश्यक है।
पूर्व उपराष्ट्रपति अंसारी का यह संबोधन ऐसे समय में आया है जब भारतीय राजनीति में राष्ट्रवाद की अवधारणा, बहुसंख्यकवाद बनाम बहुलतावाद, और संवैधानिक नैतिकता जैसे विषयों पर तीव्र बहस जारी है। उनके द्वारा नेहरू के बयान को पुनः उद्धृत करना और नूरानी की पुस्तक के माध्यम से वर्तमान राजनीतिक प्रवृत्तियों की आलोचनात्मक समीक्षा करना, संवैधानिक लोकतंत्र के समक्ष उपस्थित चुनौतियों के प्रति एक वरिष्ठ राजनेता की चिंता को दर्शाता है।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित जनों ने नूरानी के योगदान को श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके विचारों को आगे बढ़ाने का संकल्प व्यक्त किया। यह आयोजन न केवल एक विद्वान की स्मृति में था, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और बहुलतावादी भारतीय गणराज्य की अवधारणा के प्रति प्रतिबद्धता की पुनर्पुष्टि का अवसर भी बना।


















