नई दिल्ली: विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Amendment Bill) की जांच के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की पहली बैठक शुक्रवार को राजधानी दिल्ली में आयोजित की गई। भारतीय जनता पार्टी के सांसद संजय जायसवाल की अध्यक्षता वाली 31 सदस्यीय इस समिति को संसद के आगामी शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के अंतिम कार्य दिवस तक लोकसभा में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।
यह विधेयक इसी वर्ष मानसून सत्र के दौरान संसद में पेश किया गया था। विपक्षी दलों की ओर से विधेयक के कई प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताए जाने और गहन जांच की मांग उठाए जाने के बाद इसे 12 अगस्त को JPC के पास भेज दिया गया था। इससे पूर्व 25 मार्च को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने इस विधेयक को लोकसभा में पेश करते हुए कहा था कि इसका उद्देश्य विदेशी चंदे की प्राप्ति और उपयोग में पारदर्शिता लाना तथा यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी स्रोतों से प्राप्त धन का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के लिए ही हो।
विपक्ष का आरोप है कि प्रस्तावित संशोधन ईसाई गैर-सरकारी संगठनों (NGO) और अल्पसंख्यक शैक्षणिक व सामाजिक संस्थानों की वैध फंडिंग को बाधित कर एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने का प्रयास है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, समाजवादी पार्टी समेत कई विपक्षी दलों के सदस्यों ने विधेयक पेश किए जाने के समय ही इसके प्रावधानों को ‘बेहद आपत्तिजनक’ बताते हुए इसे प्रवर समिति या JPC को भेजने की मांग की थी। सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि विधेयक किसी विशिष्ट धर्म या समुदाय से संबंधित नहीं है, बल्कि यह विदेशी अंशदान के नियमन से जुड़ा एक सामान्य कानूनी ढांचा है।
संसदीय कार्य मंत्रालय द्वारा अधिसूचित समिति की संरचना में लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के सदस्य शामिल हैं, जिनमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का प्रतिनिधित्व है। लोकसभा से भाजपा के 14 सदस्य नामित किए गए हैं, जिनमें भर्तृहरि महताब, तेजस्वी सूर्या, कमलेश जांगड़े, मुकेशकुमार चंद्रकांत दलाल, निशिकांत दुबे, विष्णु दयाल राम, अनंत नायक और अरविंद धर्मपुरी प्रमुख हैं। कांग्रेस की ओर से एंटो एंटनी, कैप्टन विरियाटो फर्नांडीस, मुहम्मद हमदुल्ला सईद और काली चरण मुंडा सदस्य हैं।
राज्यसभा से नामित सदस्यों में समाजवादी पार्टी के ज़िया उर रहमान, तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बनर्जी, द्रमुक के ए राजा, तेलुगु देशम पार्टी के लावू श्री कृष्ण देवरायालू, शिवसेना के नरेश गणपत म्हस्के, जनता दल (यूनाइटेड) के कौशलेंद्र कुमार, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) की सुप्रिया सुले और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के ई टी मोहम्मद बशीर शामिल हैं। भाजपा की ओर से राज्यसभा सदस्य सी सदानंदन मास्टर, हर्षवर्धन श्रृंगला, उज्ज्वल देवराव निकम, अलका गुर्जर और सत पॉल शर्मा समिति में हैं। इसके अलावा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रफुल्ल पटेल, जद(यू) के संजय कुमार झा, कांग्रेस के क्रिस्टोफर माणिकम, तृणमूल कांग्रेस की मेनका गुरुस्वामी और द्रमुक के पी विल्सन भी पैनल का हिस्सा हैं।
विधेयक में तीन प्रमुख प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं, जिनमें से दो नियम जून 2026 से ही प्रभावी हो चुके हैं। पहला प्रावधान यह है कि पंजीकृत संस्थाओं को अपने पंजीकरण प्रमाणपत्र पर यह स्पष्ट रूप से अंकित करना होगा कि विदेशी अंशदान का उपयोग किस विशिष्ट कार्य के लिए और किस राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के किस भौगोलिक क्षेत्र में किया जाएगा। पूर्व में संस्थाएं ‘सामाजिक’, ‘धार्मिक’ या ‘शैक्षणिक’ जैसी व्यापक श्रेणियां दर्ज करा देती थीं, जिससे धन के वास्तविक उपयोग की निगरानी कठिन होती थी।
दूसरा प्रावधान धार्मिक गतिविधियों की परिभाषा को स्पष्ट करता है। विधेयक के अनुसार, पूजा स्थलों का निर्माण, धार्मिक शिक्षा प्रदान करना, सत्संग या धार्मिक प्रवचन आयोजित करना जैसी गतिविधियों की अनुमति है, लेकिन विदेशी अंशदान का उपयोग किसी व्यक्ति का धर्म परिवर्तन कराने के लिए नहीं किया जा सकेगा। यह नियम भी जून 2026 से लागू है।
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान, जिसे संशोधन विधेयक के माध्यम से जोड़ा गया है, वह संपत्ति प्रबंधन से संबंधित है। इसके तहत यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण समाप्त हो जाता है, रद्द कर दिया जाता है या निरस्त हो जाता है, तो विदेशी चंदे से अर्जित उसकी संपत्तियों की सुरक्षा, प्रबंधन और रखरखाव की जिम्मेदारी सरकार द्वारा नामित एक प्राधिकारी को सौंप दी जाएगी। विपक्षी सदस्यों ने इसी प्रावधान पर सर्वाधिक आपत्ति जताते हुए आशंका व्यक्त की है कि इसका दुरुपयोग कर अल्पसंख्यक संस्थानों की संपत्तियों को जब्त किया जा सकता है।
संयुक्त संसदीय समिति (JPC) संसद द्वारा गठित एक अस्थायी निकाय है, जिसका गठन किसी विशिष्ट विधेयक की गहन जांच या जनहित के जटिल मुद्दों की पड़ताल के लिए किया जाता है। इसका गठन तब होता है जब संसद में सामान्य चर्चा से किसी निष्कर्ष पर पहुंचना संभव न हो। JPC में दोनों सदनों के सदस्य होते हैं और इसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा नामित एक लोकसभा सदस्य करता है। समिति के पास गवाहों को बुलाने, दस्तावेज मंगाने और साक्ष्य लेने के अधिकार होते हैं।
इस बीच, विधेयक को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रिया सामने आई है। अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य रिले मूर ने एक बयान में आरोप लगाया है कि यह विधेयक ‘ईसाइयों पर सीधा हमला’ है। हालांकि, भारत सरकार ने विदेशी हस्तक्षेप को आंतरिक मामलों में अनावश्यक दखल बताते हुए ऐसी टिप्पणियों को खारिज किया है। सूत्रों के अनुसार, 12 अगस्त को संसद में इस विधेयक पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सरकार का पक्ष रख सकते थे, लेकिन विपक्ष के हंगामे और JPC गठन की मांग के बाद इसे समिति को सौंप दिया गया।
समिति के समक्ष अब विधेयक के प्रत्येक खंड की विस्तृत जांच, हितधारकों के सुझाव आमंत्रित करने, संबंधित मंत्रालयों के अधिकारियों से स्पष्टीकरण लेने और सर्वसम्मति या बहुमत से सिफारिशें तैयार करने का कार्य है। शीतकालीन सत्र की समयसीमा को देखते हुए समिति को त्वरित गति से कार्य करना होगा। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि समिति की रिपोर्ट और उस पर संसद में होने वाली बहस न केवल FCRA कानून के भविष्य को तय करेगी, बल्कि गैर-सरकारी क्षेत्र, धार्मिक स्वतंत्रता और विदेशी सहायता नीति पर भी दूरगामी प्रभाव डालेगी।


















