बैंकॉक15 मिनट पहले
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साल 2014 की बात है। देश में 10 साल बाद BJP की सरकार बनी थी। मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इसमें पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम नवाज शरीफ के साथ SAARC देशों के 6 नेता भी आए। ऐसा पहली बार हुआ, जब किसी भारतीय PM के शपथ ग्रहण में विदेशी नेता पहुंचे थे।
6 महीने बाद मोदी SAARC समिट में शामिल होने काठमांडू पहुंचे। इस समिट में भारत का जोर रेल और मोटर व्हीकल एग्रीमेंट लाने पर था, लेकिन पाक सरकार ने इसमें अड़ंगा लगा दिया। इतना ही नहीं, पाकिस्तान ने SAARC में ऑब्जर्वर कंट्री चीन के सिल्क रोड प्रोजेक्ट को पेश करने की वकालत की।
मोदी इससे इतना नाराज हुए कि उन्होंने नवाज शरीफ से आधिकारिक मुलाकात तक नहीं की। साल 2016 में ऊरी अटैक के बाद भारत ने SAARC समिट में शामिल होने के लिए पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया।
भारत के इनकार के बाद बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान ने भी पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया। इस घटना के 9 साल बीत जाने के बाद आज तक SAARC का फिर कोई समिट नहीं हो पाई है।
सार्क समिट 2014 में मोदी और नवाज शरीफ की यह तस्वीर काफी चर्चा में रही थी। हालांकि दोनों देशों ने इस मुलाकात को औपचारिक दर्जा नहीं दिया।
भारत सरकार अब SAARC की जगह BIMSTEC को आगे बढ़ाने पर ध्यान दे रही है। पाकिस्तान इस संगठन का हिस्सा नहीं है।
PM मोदी पहली आधिकारिक यात्रा पर गुरुवार को थाईलैंड पहुंचे थे। आज वे BIMSTEC समिट में शामिल होंगे। आज यहां उनकी मुलाकात बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस और नेपाल के पीएम केपी शर्मा ओली से हो सकती है।
स्टोरी में जानेंगे कि BIMSTEC क्या है, भारत के लिए यह जरूरी क्यों है…
1990 के दशक में शीत युद्ध के अंत और सोवियत संघ के पतन के बाद दुनिया तेजी से बदली। ग्लोबलाइजेशन के दौर में देशों को आर्थिक गठबंधन बनाने पर मजबूर होना पड़ा। साउथ और साउथ-ईस्ट एशिया के देशों में इस बात की जरूरत महसूस हुई।
साउथ-ईस्ट एशियाई देशों के पास ASEAN (Association of Southeast Asian Nations) था, जो काफी हद तक सफल था, लेकिन इसमें भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों को कोई जगह नहीं मिली थी। यानी, भारत और उसके पड़ोसी देशों के लिए कोई ऐसा मंच नहीं था जो आर्थिक सहयोग को मजबूती से आगे बढ़ा सके।
थाईलैंड के पूर्व विदेश मंत्री थानात खमनन ने 1994 में BIMSTEC की स्थापना का विचार दिया था। थाईलैंड ने ‘लुक वेस्ट पॉलिसी’ के तहत एक क्षेत्रीय ग्रुप के गठन का प्रस्ताव रखा था जो दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया को जोड़ सके। भारत को भी अपनी लुक ईस्ट पॉलिसी के तहत दक्षिण पूर्व एशिया के साथ अपने संबंध मजबूत करने थे। इसलिए दोनों देशों की पहल पर 1997 में इसका गठन हुआ।
बंगाल की खाड़ी से लगे देशों को साथ लाकर बनाया संगठन BIMSTEC बंगाल की खाड़ी से सटे हुए सात देशों का एक क्षेत्रीय संगठन है। इसका पूरा नाम बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी सेक्टोरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक को-ऑपरेशन है। इसका गठन 1997 में हुआ था।
शुरुआत में इसमें चार देश थे और इसे BIST-EC यानी बांग्लादेश, भारत, श्रीलंका और थाईलैंड आर्थिक सहयोग संगठन कहा जाता था। 1997 में ही म्यांमार और 2004 में भूटान और नेपाल के शामिल होने पर इसका नाम BIMSTEC हो गया।
बंगाल की खाड़ी से लगे तटीय देशों में नेपाल और भूटान शामिल नहीं हैं। ये दोनों देश चारों तरफ से घिरे हुए हैं। फिर भी इन्हें इस संगठन में शामिल किया गया है क्योंकि ये दोनों ही देश हाइड्रोपावर (पानी से बनी बिजली) के बड़े स्रोत हैं।
भारत ने ईस्ट एशिया में कनेक्टिवटी के लिए शुरू की पॉलिसी भारत ने 1991 में पूर्व एशिया में स्थित देशों के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए लुक ईस्ट पॉलिसी शुरू की थी। साल 2014 में इसमें बड़ा बदलाव करते हुए इसे लुक ईस्ट से एक्ट ईस्ट पॉलिसी में बदल दिया गया।
80% समुद्री ऑयल ट्रेड और 40% ग्लोबल ट्रेड हिंद महासागर के जरिए होता है। ऐसे में भारत के लिए बंगाल की खाड़ी और उससे आसपास मौजूद देश बेहद अहम हैं।
दूसरी तरफ चीन ने अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के जरिए इस क्षेत्र में अपने कदम जमा लिए हैं। ऐसे में भारत BIMSTEC के सदस्य देशों के जरिए चीन के BRI को काउंटर करना चाहता है। ऐसे में यहां मौजूद बंगाल की खाड़ी और उसके आसपास के देशों का महत्व काफी ज्यादा बढ़ गया है।
पाकिस्तान की वजह से SAARC छोड़ BIMSTEC पर भारत का फोकस BIMSTEC को SAARC (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) का विकल्प भी माना जाता है। 1985 में स्थापित SAARC में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, मालदीव, भूटान, अफगानिस्तान शामिल हैं।
मोदी सरकार ने 2014 में नेपाल में आयोजित SAARC समिट की नाकामी के तुरंत बाद BIMSTEC एक्टिविटी को बढ़ाने पर जोर देना शुरू कर दिया था। SAARC में शामिल सभी देशों के पास वीटो पावर होता है, पाकिस्तान इसका इस्तेमाल करके जरूरी समझौते में अड़ंगा लगा देता था। SAARC के उलट BIMSTEC में किसी देश के पास वीटो पावर नहीं हैं।
सितंबर 2016 में जम्मू-कश्मीर के उरी में भारतीय सेना के अड्डे पर हुए आतंकी हमले के बाद, उस साल इस्लामाबाद में होने वाला SAARC सम्मेलन रद्द कर दिया गया था, क्योंकि ग्रुप के अन्य सदस्यों ने भारत के साथ मिलकर इसका बहिष्कार किया था। उसके बाद से आज तक कोई भी SAARC सम्मेलन आयोजित नहीं हुआ।
BIMSTEC की 4 चुनौतियां, 20 साल से FTA पर नहीं हुआ समझौता
1. BIMSTEC देशों ने 2004 में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को लेकर समझौता किया था, लेकिन अभी तक इसे लागू नहीं किया गया।
2. संगठन को औपचारिक चार्टर अपनाने में 25 साल लग गए, जिससे बेहतर संस्थान बनाने में देरी हुई और फैसले लेने की प्रोसेस धीमी हो गई।
3. बांग्लादेश और म्यांमार के बीच तनाव, बांग्लादेश और भारत के बीच तनाव जैसे मुद्दे भी इस संगठन के लिए चुनौती बन रहे हैं।
4. थाईलैंड और म्यांमार जैसे देश BIMSTEC से ज्यादा आसियान को प्राथमिकता देते हैं।
भारत की इकोनॉमी से डरते हैं छोटे देश
BIMSTEC में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) लागू करने में कई दिक्कतें हैं। दरअसल, इसमें शामिल देशों की इकोनॉमी बहुत अलग-अलग हैं। भारत और थाईलैंड जैसे मजबूत इकोनॉमी वाले देश 2004 से ही FTA लागू करना चाहते हैं, लेकिन भूटान, नेपाल, म्यांमार जैसे कमजोर इकोनॉमी वाले देश ऐसा नहीं चाहते।
इन्हें डर है कि FTA लागू होने से उनकी घरेलू इंडस्ट्रीज पर नकारात्मक असर पड़ेगा और वे सस्ते आयात से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे।