बंगाल में बीजेपी ने हिंदुत्व का वो रूप दिखाया जो उत्तर भारत से बिल्कुल अलग था- माछ भात खाते हुए, मां काली का नाम लेते हुए। असम में मुस्लिम वोट इस तरह बंटे कि विपक्ष का गणित ही बिगड़ गया।
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केरलम में राहुल गांधी ने भगवान अयप्पा के नाम पर वो नैरेटिव सेट किया, जिसे लेफ्ट काट नहीं पाया। और तमिलनाडु में विजय ने साबित किया कि स्टारडम अगर सही रणनीति से मिले, तो वो असली राजनीतिक ताकत बन जाता है।
हर राज्य का अपना फॉर्मूला था। हर जीत के पीछे एक अलग कहानी। इलेक्शन एक्सप्लेनर में जानिए वो 5 फैक्टर, जो इन नतीजों की असली वजह बने…

बंगाल में बीजेपी ने माछ-भात और मां काली के दम पर साधे हिंदू वोटर
- 2011 में खाता न खोल पाने वाली बीजेपी ने 2021 में 77 सीटें जीतीं और अब बंगाल में सरकार बनाने वाली है। पिछली दो चुनाव आंकड़े साफ बताते हैं कि बीजेपी को 50% से ज्यादा हिंदुओं का वोट मिला।

- इसी वोटबैंक को साधने के लिए बीजेपी ने दो बड़े दांव चले… माछ-भात और जय मां काली।
- ममता बनर्जी ने कहा कि बीजेपी की सरकार बनी, तो मछली, मांस और अंडा खाना बंद हो जाएगा। बीजेपी ‘माछे-भात बंगाली’ की पहचान को खत्म कर देगी।
- इसे पलटवार में बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने सार्वजनिक तौर पर मछली खाई। मछली के साथ प्रचार हुआ। शाह ने भी कहा कि माछ-भात खाने वाला ही बंगाल का सीएम होगा।
- उत्तर भारत में हिंदुत्व को शाकाहार से जुड़ा जाता है, लेकिन बंगाल में शक्ति की पूजा सर्वोपरि है, जिसमें मछली को ‘महाप्रसाद’ माना जाता है।
- इसी दांव को आगे बढ़ाते हुए बीजेपी ने ‘जय श्रीराम’ के बजाय ‘जय मां काली’ का नारा लगाया। क्योंकि पिछले चुनाव में बीजेपी के ‘जय श्री राम’ के नारे को ‘जय मां काली’ से काउंटर किया था, जिसका उसे फायदा हुआ। बीजेपी ने इससे सीख ली।
- वहीं टीएमसी सांसद सयानी घोष ने मुस्लिम इलाकों की रैलियों में ‘मेरे दिल में है काबा, और मेरी आंखों में मदीना’ गीत गाया। इसको लेकर अमित शाह और योगी आदित्यनाथ जैसे बीजेपी नेताओं ने ‘काली बनाम काबा’ मुद्दा बनाया।
असम में मुस्लिम वोट बंटे, तो कामयाब हुई बीजेपी
- 2021 में कांग्रेस और AIUDF ने साथ चुनाव लड़ा, तो 89% बंगाली मुस्लिमों और 65% असमी मुस्लिमों ने उन्हें वोट दिया। इस बार इन दोनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा।
- बीजेपी की स्ट्रैटजी साफ थी कि मुस्लिम वोट बांटकर विपक्ष को होने वाले फायदे को घटाया जाए। बीजेपी ने असम के मूल मुस्लिमों को भी अपने पाले में करने की कोशिश की।
- पॉलिटिकल एक्सपर्ट डॉ. जयदीप बरुआ मानते हैं कि हिमंता मुस्लिमों में गुटबाजी करने में सफल रहे। पहले उन्होंने बांग्लादेश से आए मियां मुस्लिमों को असमी मुस्लिमों के लिए खतरा बताया। फिर असमी मुस्लिमों को विशेष दर्जा देकर अपने पाले में किया।
- चुनावी रैलियों में हिमंता बिस्व सरमा ने दावा किया कि हर हफ्ते 35-40 बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेज रहे हैं। इससे हिंदू वोटों में बीजेपी की पकड़ मजबूत होती गई।
केरलम में UDF ने एकजुट किए मुस्लिम-ईसाई वोटर
- केरलम में 26.6% मुस्लिम और 18.4% ईसाई आबादी है, यानी दोनों मिलकर करीब 45% वोटर्स। जिस पार्टी ने इन्हें साध लिया समझो चुनाव जीत गए।
- 2021 में 58% मुस्लिमों ने UDF और 37% ने LDF को वोट दिया था। क्योंकि हिंदुओं को साधने के चक्कर में LDF से मुस्लिम छिटक गए। वहीं LDF को 37% और UDF को 57% ईसाई वोट मिले।
- सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च के डायरेक्टर डॉ. धनुराज बताते हैं, ‘कई सर्वे बता रहे हैं कि इस बार माइनॉरिटी एकजुट होकर UDF को वोट किया है। पिछले इलेक्शन में यही वोट LDF को मिला था, जिससे UDF कमजोर पड़ गई थी।’

बंगाल में बीजेपी के पक्ष में रहा SIR
- पश्चिम बंगाल में हुए SIR में 91 लाख वोटर्स के नाम हटाए गए। पहले चरण में 64 लाख और फिर लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर 27 लाख। कुल वोटर्स की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.75 करोड़ रह गई।
- द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक हटाए गए नामों में से 57.47 लाख हिंदू हैं, यानी 63% और 31.1 लाख मुस्लिम है, यानी 34%। जबकि 2011 की जनगणना के हिसाब से राज्य में 27% मुस्लिम आबादी है।
- पॉलिटिकल साइंटिस्ट आशुतोष वार्ष्णेय मानते हैं कि बीजेपी की जीत में एक भूमिका बंगाल में SIR से मुस्लिम वोटरों की घटी संख्या भी है। यह केवल व्यावहारिक राजनीति का मामला नहीं है, बल्कि दुनिया में लोकतंत्र पर होने वाली बहसों का हिस्सा बनने वाला है।
- SIR की न्यायिक प्रक्रिया के डेटा एनालिसिस के मुताबिक, 45 सीटें ऐसी हैं, जहां 2021 के हार के मार्जिन से ज्यादा वोट कटे हैं। इनमें से 41 सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की है।
असम में परिसीमन के बाद 36% मुस्लिम बहुल सीटें घटीं
- 2023 में असम में परिसीमन हुआ। ST-SC की रिजर्व सीटें और बोडोलैंड ट्राइब्स की सीटें बढ़ीं, लेकिन मुस्लिम बहुल सीटें 41 से घटकर 26 रह गईं।
- अनुमान है कि राज्य में मुस्लिम आबादी करीब 40% है। फिर भी उनकी सीटें घट गई।
- बीजेपी ने 90 में से एक भी सीट पर किसी मुस्लिम को टिकट नहीं दी। उसकी साथी पार्टियों ने 36 में से 13 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे। वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाले महाजोत ने 22 मुस्लिमों की टिकट दी।
- पॉलिटिकल एनालिस्ट अशोक मलिक मानते हैं कि सीटों की नई सीमाओं ने मुस्लिम बहुल इलाकों का असर कम कर दिया। जिन सीटों पर असमिया मुस्लिम कम हो रहे थे, उन्हें फिर से तय किया गया। इससे बीजेपी को उन सीटों पर बढ़त मिली जहां वो कमजोर थी।’

बंगाल में ममता की 15 साल की एंटी-इनकमबेंसी
- 2011 के बाद लगातार 15 सालों से टीएमसी सत्ता पर काबिज है और ममता बनर्जी सीएम हैं।
- इतने लंबे शासन में एंटी-इनकमबेंसी जैसा फैक्टर एक्टिव हो जाता है। इससे निपटने के लिए टीएमसी ने 74 विधायकों के टिकट काट दिए और 15 विधायकों की सीट बदल दी।
- Axis My India के डायरेक्टर प्रदीप गुप्ता मानते हैं कि किसी भी सरकार के लिए तीन कार्यकाल, यानी 15 साल बहुत होते हैं। खासकर डिजिटल के दौर में। लाखों युवा वोटर्स ने टीएमसी के अलावा किसी दूसरी पार्टी की सरकार नहीं देखी है।
- बीजेपी ने भी इसी एंटी-इनकमबेंसी को भुनाया और टीएमसी नेताओं के खिलाफ करप्शन और सिंडिकेट राज को मुद्दा बनाया। संदेशखाली और आरजी कर जैसी घटनाओं को सिस्टम की नाकामी बताया। घुसपैठ, सुरक्षा और बेरोजगारी का नैरेटिव सेट किया।
असम में हिमंता की बेतहाशा पॉपुलैरिटी
- हिमंता बिस्वा सरमा की रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ वोट में कन्वर्ट हुई। उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा उठाया। इससे असमी संस्कृति, परंपरा और भाषा को खतरा बताया।
- पॉलिटिकल एक्सपर्ट अदिप फुकन के मुताबिक, असम में पहली बार बीजेपी ने पूरा चुनाव हिमंता के चेहरे पर लड़ा। उन्होंने अपने तीखे बयानों से खुद को योगी जैसे कट्टर नेता के तौर पर पेश किया और सफल हुए।
- VoteVibe के सर्वे के मुताबिक, असम के 46.6% जनता हिमंता बिस्व सरमा को सीएम बनाना चाहती है।
- असम के सीनियर जर्नलिस्ट राजीव दत्ता मानते हैं कि 10 साल सरकार में रहने के बाद भी बीजेपी के खिलाफ एंटी-इनकम्बेंसी नहीं थी। कुछ सीटों पर पुराने विधायकों से नाराजगी जरूर थी, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा।
सुपरस्टार से नेता बने विजय ने बदली तमिल राजनीति
- थलपति विजय तमिल फिल्मों के सबसे बड़े सुपरस्टार्स में से एक हैं। अभी वे अपने करियर के चरम पर हैं। इसी स्टारडम के रहते 2024 में उन्होंने अपनी पार्टी TVK बनाई।
- विजय ने अपने दम पर सभी 234 सीटों पर कैंडिडेट खड़े किए, जिनमें से 107 सीटों पर जीत हासिल की। 35% से ज्यादा वोट भी मिला।
- दरअसल, तमिलनाडु की राजनीति में दशकों से फिल्मी सितारों का प्रभाव रहा है। एम.जी. रामचंद्रन, शिवाजी गणेशन, जे. जयललिता, एम. करुणानिधि के बाद अब विजय भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाने में सफल हुए हैं।
- विजय की पार्टी के ज्यादातर नेता DMK और AIADMK के बागी हैं। इससे ये साफ दिखा कि TVK को इतनी सीटें विजय के स्टारडम के बूते ही मिली हैं।

सितंबर 2025 में विजय ने तिरुची से पहला कैम्पेन शुरू किया था, उनकी पहली ही रैली में जबरदस्त भीड़ हुई थी।
केरलम में विजयन विवादों में घिरे, 10 साल की एंटी-इनकमबेंसी
- केरलम के सीएम और LDF का चेहरा पिनराई विजयन के परिवार पर करप्शन के कई मामले चल रहे हैं। सबरीमाला मंदिर से सोना चोरी मामले में 9 गिरफ्तारी हो चुकी हैं। इसमें लेफ्ट नेता ए. पद्मकुमार भी हैं।
- राहुल गांधी ने अपनी रैलियों में यह मुद्दा उठाकर कहा था कि जो सरकार भगवान अयप्पा का सम्मान नहीं कर सकती, केरलम के लोगों का सम्मान क्या करेगी?
- ऐसे में विजय को लेकर एंटी-इनकमबेंसी फैक्टर भी रहा। दरअसल, केरलम में 1977 से 2016 तक हर चुनाव में सत्ता बदली। 2021 में यह ट्रेंड टूटा और लगातार दो बार LDF सरकार बनी।
- लेकिन 10 साल एक ही सरकार रहने के बाद ट्रेंड फिर वापस आ गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में UDF ने 18 और LDF ने सिर्फ 1 सीट जीती। फिर 2025 के निकाय चुनाव में UDF को 38.81% और LDF को 33.45% वोट मिले।
- LDF ने 81 साल के पिनराई विजयन के चेहरे पर ही चुनाव लड़ा, जिससे नैरेटिव बना कि लेफ्ट के पास विजयन के अलावा और कोई चेहरा नहीं है।

बंगाल में बीजेपी ने महिलाओं को ₹3000 देने का वादा किया
- ममता बनर्जी ने टीएमसी के लिए महिला वोटबैंक तैयार किया, जिसके दम पर वे सत्ता में काबिज होती रहीं।

- इसी वोटबैंक को साधने के लिए बीजेपी ने हर महीने 3 हजार रुपए देने का वादा किया। मेनिफेस्टो में महिलाओं से जुड़े 15 वादे किए। जैसे- सरकारी नौकरी में 33% आरक्षण, फ्री बस सर्विस।
- वहीं चुनाव से पहले केंद्र की बीजेपी सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाकर 3 बिल पेश किए। कहा कि ये बिल महिला आरक्षण को लागू करने के लिए जरूरी है।
- लेकिन विपक्ष ने कहा कि महिला आरक्षण की आड़ में बीजेपी परिसीमन कराना चाहती है। सभी विपक्षी पार्टियों ने इसका विरोध किया और बिल पास नहीं हो सके।
- बीजेपी ने नैरेटिव बनाया कि वे महिलाओं को सत्ता में 33% हिस्सेदारी दे रहे हैं, लेकिन कांग्रेस, टीएमसी समेत पूरा विपक्ष विरोध कर रहा है।
- बीजेपी ने बंगाल में महिला सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े किए। बीजेपी ने इस नैरेटिव को साधने के लिए इन मामलों के बड़े चेहरों को टिकट दे दिया।
- संदेशखाली आंदोलन का चेहरा बनीं रेखा पात्रा को हिंगलगंज सीट और आरजी कर रेप केस में पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ को पनिहाटी सीट से टिकट दिया।
- रेखा पात्रा ने एक लाख से ज्यादा और रत्ना देबनाथ ने 28 हजार से ज्यादा के मार्जिन के साथ जीत हासिल की।

24 अप्रैल को दमदम में पीएम नरेंद्र मोदी ने आरजी कर रेप केस की पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ के लिए रैली की थी। रत्ना ने पनिहाटी सीट से बीजेपी टिकट पर चुनाव जीता।
तमिलनाडु में विजय ने साधे महिला और युवा वोटर
- चुनावी रैलियों में महिलाओं और युवाओं में विजय को लेकर अलग तरह की दीवानगी देखने को मिली। ज्यादातर युवा वोटर्स उनकी फिल्में देखकर बड़े हुए हैं।
- विजय के इन्हें साधने के लिए वादे भी किए- दुल्हनों को 8 ग्राम सोना, नवजात बच्चों को सोने की अंगूठी, 10 लाख नौकरी और प्राइवेट जॉब्स में 80% आरक्षण, वगैरह।
- राज्य में करीब 2 करोड़ युवा और महिला वोटर्स हैं, जो 20-30 सीटों पर सीधा असर डालते हैं। TVK इन्हें अपने पाले में करने में सफल हुई।
- पॉलिटिकल एक्सपर्ट आर रंगराज मानते हैं कि विजय ने सिर्फ अपने चेहरे और अपील के दम पर ये चुनाव जीता। उन्होंने 2-3 महीने कड़ी मेहनत की। फिर होशियारी से स्ट्रैटजी बनाई और टिकट बांटे।

जहां टीएमसी ने 3 चुनाव जीते, वैसी 74 सीटें बीजेपी ने जीतीं
बीजेपी ने 2021 के चुनाव के मुकाबले अपना वोट शेयर 8% बढ़ाया और 130 सीटें ज्यादा जीतीं। जबकि टीएमसी का वोट शेयर 8% तक घटा और 134 सीटें कम हो गईं।

तमिलनाडु में DMK के गढ़ में विजय ने वोट झटके
- DMK अब तक तमिलनाडु की सबसे बड़ी पार्टी थी। 2021 के चुनाव में उसे राज्य के तीन हिस्सों- सेंट्रल, नॉर्थ और कावेरी डेल्टा रीजन से सबसे ज्यादा वोट मिले थे।
- इन तीनों इलाकों की सीटों पर उसका वोट शेयर 45% से ज्यादा रहा। यहां ज्यादातर शहरी सीटें हैं, जिनमें युवा और महिला वोटर्स निर्णायक हैं। विजय ने DMK के इन्हीं वोटों में सेंधमारी की।
- एक्सपर्ट्स मानते हैं कि विजय की TVK ने इन इलाकों में दलित और अल्पसंख्यक वोटर्स में पैठ जमाई, जो कुल वोटर्स का 26% हैं।
- चेन्नई के सीनियर जर्नलिस्ट शब्बीर अहमद बताते हैं, ‘DMK और AIADMK ने शुरुआत में TVK को बड़ा किरदार नहीं माना, जबकि वोटर्स नया विकल्प चाहते थे। ऐसे में TVK ने अंदरखाने दोनों पार्टियों से असंतुष्ट वोटरों को साधा।’

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हिंदुत्व की राजनीति का बड़ा प्रतीक है गंगा। बंगाल में प्रचंड जीत के बाद अब गंगोत्री से गंगासागर तक, गंगा किनारे के चारों बड़े राज्यों में बीजेपी की सरकार होगी। अपवाद सिर्फ 45 किमी का वो इलाका है, जहां गंगा झारखंड में बहती है। अब देश के 22 राज्यों में एनडीए की सरकार और 17 में बीजेपी के मुख्यमंत्री होंगे। इससे पहले 2018 में 21 राज्यों में एनडीए की सरकार थी। अब बीजेपी ने अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दिया है। पूरी खबर पढ़िए…















