Norways Massive Fund | PM Modi Visit

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नॉर्वे की आबादी सिर्फ 56 लाख है। दिल्ली की एक चौथाई भी नहीं। लेकिन इस छोटे से देश के पास ऐसा सरकारी फंड है, जो भारत की पूरी GDP का आधा है। 2.1 ट्रिलियन डॉलर। अगर बांटा जाए, तो नॉर्वे के हर नागरिक को करीब ₹3.5 करोड़ मिलेंगे।

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लेकिन अपने देश पर खर्च करने की बजाए नॉर्वे ने इस फंड से दुनिया के 68 देशों की 7200 कंपनियों में हिस्सेदारी खरीद रखी है। 18 मई को नॉर्वे पहुंचे पीएम मोदी ने भारत की क्लीन एनर्जी में इसी फंड से निवेश का न्योता दिया।

आखिर नॉर्वे ने इतना बड़ा फंड कैसे बनाया, ये चलता कैसे है, भारत में कितना निवेश किया और नॉर्वे अपने नागरिकों को यह पैसा बांट क्यों नहीं देता; जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में…

नॉर्वे आमदनी के लिहाज से छठा और खुशहाली के मामले में 7वां सबसे सम्पन्न देश है। यहां की आबादी 56 लाख है। हर शख्स औसतन एक लाख डॉलर, यानी 96 लाख रुपए सालाना कमाता है। लेकिन 60 साल पहले तक ऐसा नहीं था।

उत्तरी यूरोप में बसे नॉर्वे की जियोग्राफी काफी दुर्गम रही है- चारों तरफ बर्फ से ढके पहाड़, गहरे समुद्री रास्ते।

1960 के दशक तक ज्यादातर आबादी कमाई के लिए मछली पकड़ती, लकड़ी काटती या जहाजों पर काम करती। तब न कोई बड़ा उद्योग था और न कोई कार या टेक कंपनी। नौकरी के लिए युवा दूसरे देश चले जाते।

नॉर्वे के अर्थशास्त्रियों को लग रहा था कि उनके पास संसाधन ही नहीं हैं। किसी चमत्कार के दम पर ही विकासशील देश बना जा सकता है। तभी एक चमत्कार हो गया।

1959 में नॉर्वे के पड़ोसी देश नीदरलैंड्स को तटीय इलाके ‘ग्रोनिंगन’ में नेचुरल गैस का एक बहुत बड़ा भंडार मिला। पूरे यूरोप में तेल और गैस की खोज की होड़ मच गई।

नॉर्वे के भूवैज्ञानिकों ने भी समुद्र में खोज शुरू करने का मन बनाया। इस बीच 1962 में अमेरिकी कंपनी फिलिप्स पेट्रोलियम ने नॉर्वे सरकार को एक ऑफर दिया- ‘हमें उत्तरी समुद्र में तेल खोजने का इजाजत दीजिए। बदले में हर महीने 1.6 लाख डॉलर देंगे।’

1965 में नॉर्वे सरकार ने फिलिप्स पेट्रोलियम, शेल और एस्सो जैसी बड़ी तेल कंपनियों को 22 लाइसेंस जारी किए। इन कंपनियों को समुद्र में ड्रिल करने, तेल-गैस खोजने और निकालने का अधिकार था।

अगस्त 1965 में विदेश मंत्रालय के अधिकारी जेन्स एवेन्सन (बाएं) और उद्योग मंत्री कार्ल ट्रास्ती (दाएं) ने लाइसेंस जारी कर ऐलान किया कि गर्मियों से समुद्र में तेल की खोज शुरू हो सकती है।

अगस्त 1965 में विदेश मंत्रालय के अधिकारी जेन्स एवेन्सन (बाएं) और उद्योग मंत्री कार्ल ट्रास्ती (दाएं) ने लाइसेंस जारी कर ऐलान किया कि गर्मियों से समुद्र में तेल की खोज शुरू हो सकती है।

1966 की गर्मियों में पहला तेल कुआं खोदा गया, लेकिन वह सूखा निकला। अगले साल बाल्डर के इलाके में तेल मिला, लेकिन सरकार और कंपनियों को लगा यहां से तेल काफी चुनौती भरा और खर्चीला है।

कुल 36 कुएं खोदे गए, लेकिन किसी में भी तेल नहीं मिला। कंपनियों ने अपना डेरा समेटने का फैसला किया। लेकिन फिलिप्स पेट्रोलियम को अभी एक और कुंआ खोदना बाकी था।

23 दिसंबर 1969, यानी क्रिसमस से 2 दिन पहले। फिलिप्स पेट्रोलियम के आखिरी कुएं से अचानक काला, गाढ़ा और चिपचिपा तरल फूट पड़ा। इंजीनियर समझ गए थे कि उन्हें कामयाबी हाथ लग गई।

जिस इलाके में तेल निकला, उसे ‘एकोफिस्क फील्ड’ नाम दिया गया। नॉर्वे के तट से करीब 300 किमी दूर ये फील्ड दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस भंडारों में से एक बना।

फिलिप्स पेट्रोलियम के ड्रिलिंग रिग ‘ओशन वाइकिंग’ ने एकोफिस्क फील्ड की खोज की थी। यह उसी ओशन वाइकिंग की तस्वीर है।

फिलिप्स पेट्रोलियम के ड्रिलिंग रिग ‘ओशन वाइकिंग’ ने एकोफिस्क फील्ड की खोज की थी। यह उसी ओशन वाइकिंग की तस्वीर है।

1971 से नॉर्वे ने तेल कारोबार शुरू किया। विदेशी कंपनियों ने डेरा डाला। इन्हें खुदाई करने के लिए सरकार से कड़ी शर्तों पर लाइसेंस लेना पड़ता था। सरकार तय करती कि कितना और कब तक तेल निकालेंगे, ताकि पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।

फिर 1972 में नॉर्वे की संसद ने राष्ट्रीय तेल कंपनी बनाई, जिसका नाम रखा- स्टेटऑयल (अब इक्विनोर)। नियम बना कि उत्तरी सागर के किसी भी तेल प्रोजेक्ट में कम से कम 50% की हिस्सेदारी इस सरकारी कंपनी की होगी। नॉर्वे की किस्मत बदल चुकी थी, लेकिन तभी 2 बड़े झटके लगे…

पहला झटका: 78% टैक्स लगाकर खजाना भरा, लेकिन महंगाई बढ़ गई

  • 1975 में नॉर्वे ने तेल कंपनियों पर मुनाफे का लगभग 78% टैक्स लगा दिया। नॉर्वे के खजाने भरने लगे। उन्होंने घरेलू खर्च बेतहाशा बढ़ा दिया। सब्सिडी और फ्रीबीज की बाढ़ आ गई।
  • 1978-79 तक नॉर्वे में भयंकर महंगाई बढ़ गई। मजदूरी इतनी महंगी हो गई कि नॉर्वे की बाकी इंडस्ट्रीज घाटे में चली गईं और बंद होने लगीं।

दूसरा झटका: तेल की कीमतें गिरीं, तो बैंक बर्बाद हो गए

  • 1980 की शुरुआत तक नॉर्वे पूरी तरह से तेल की कमाई पर निर्भर हो चुका था। तभी १९८६ में तेल की कीमतें धड़ाम हो गईं। 28 डॉलर प्रति बैरल से गिरकर 10 डॉलर प्रति बैरल।
  • कमाई एक तिहाई होने से सरकार भारी घाटे में चली गई। बेरोजगारी चरम पर पहुंच गई। जिन लोगों और कंपनियों ने बैंकों से कर्ज ले रखा था, वे उसे नहीं चुका पाए।

अचानक मिला बहुत सारा पैसा किसी देश के लिए वरदान नहीं, बल्कि अभिशाप बन जाता है। अर्थशास्त्र में इसे ‘रिसोर्स कर्स’ कहा जाता है। इसी रिसोर्स कर्स को बेअसर करने के लिए नॉर्वे ने कई कदम उठाए।

सरकार ने देश के 4 सबसे बड़े बैंकों में से 3 का राष्ट्रीयकरण किया। टैक्स ढांचा बदला। कई सब्सिडी, मुफ्त की सुविधाएं वगैरह बंद कीं। अपना बजट ठीक किया।

मई 1990 में नॉर्वे की संसद में एक बिल पास हुआ- गवर्नमेंट पेट्रोलियम फंड एक्ट। इस कानून के मुताबिक, ‘तेल से होने वाली अतिरिक्त कमाई एक अलग फंड में जाएगी, जिसे सरकार खर्च नहीं कर सकती।’

यहीं से जन्म हुआ दुनिया के सबसे बड़े सॉवरेन वेल्थ फंड का, जिसे आज ‘गवर्नमेंट पेंशन फंड ग्लोबल’ कहा जाता है। हर्मोड स्कैनलैंड, जॉन एम. हार्टविक जैसे अर्थशास्त्रियों की सोच इस कानून का आधार बनी-

‘जो तेल हमें समुद्र के नीचे मिला है, यह हमारी जागीर नहीं है। यह हमारे पूर्वजों की मेहनत और आने वाली पीढ़ियों की अमानत है। तेल आज है, कल खत्म हो जाएगा। इसलिए हमें इस ‘काले सोने’ (तेल) को ‘अमर धन’ (फंड) में बदल देना चाहिए। ताकि जब तेल खत्म हो, तब भी हमारी नई पीढ़ियां इसी अमीरी और सुरक्षा के साथ जी सकें।’

1996 में 400 मिलियन डॉलर फंड में जमा हुए। आज इसमें 2.1 ट्रिलियन डॉलर जमा हैं। इसे संभालने की जिम्मेदारी नॉर्वे की फाइनेंस मिनिस्ट्री के पास है, जो नॉर्वे की संसद के प्रति जवाबदेह है।

1 जनवरी 1998 से इस फंड के ऑपरेशनल काम ‘नॉर्जेस बैंक इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट’ संभाल रहा है, जो नॉर्वे के सेंट्रल बैंक ‘नॉर्जेस बैंक’ का एक डिपार्टमेंट है। इसके दफ्तर ओस्लो, न्यूयॉर्क, लंदन और सिंगापुर जैसे बड़े कारोबारी शहरों में हैं। करीब 700 प्रोफेशनल्स, इकोनॉमिस्ट्स, इंजीनियर्स, फाइनेंस एक्सपर्ट्स वगैरह इस फंड को मैनेज करते हैं।

1. पैसे को देश से बाहर रखो

  • तेल की कमाई का एक पैसा नॉर्वे के किसी प्रोजेक्ट में सीधे नहीं लगा सकते। सड़क, पुल, मॉल या अस्पताल बनाने में भी नहीं।
  • इस फंड को अमेरिकी डॉलर, यूरो, ब्रिटिश पाउंड, जापानी येन जैसी विदेशी करेंसी में बदल दिया जाता है और दुनियाभर के बाजारों में निवेश कर दिया जाता है।
  • ऐसा क्यों: अगर सरकार अरबों डॉलर नॉर्वे के घरेलू बाजार में डाल देती, तो पैसों की बाढ़ आ जाती, जिससे महंगाई का खतरा बनता। क्योंकि लोग ज्यादा खर्च करते, लेकिन सामान उतना नहीं होता।

2. वैल्यू का सिर्फ 3% खर्च करो

  • 2001 में नॉर्वे की संसद ने एक नियम बनाया, जिसे ‘बर्ड-इन-द-हैंड रूल’ या फिस्कल रूल कहा जाता है।
  • नॉर्वे की सरकार अपने सालाना बजट की कमी इस फंड से पूरी नहीं कर सकती। इसके प्रिंसिपल अमाउंट को कभी छू नहीं सकती।
  • सरकार को हर साल फंड की कुल वैल्यू का सिर्फ 4% निकालने की इजाजत थी। 2017 में इसे घटाकर 3% कर दिया गया।
  • ऐसा क्यों: फंड हर साल औसतन 3-4% का मुनाफा आसानी से कमाता है। यानी सरकार फंड का मूल नहीं, बल्कि मुनाफा खर्च करती है।

3. गड़बड़ जगहों में पैसा मत फंसाओ

नॉर्वे के फंड का पैसा निवेश करने के बेहद कड़े नैतिक नियम हैं। सिर्फ मुनाफे के लिए ऐसी कंपनियों में पैसा नहीं लगाया जाता, जो…

  • परमाणु हथियार, क्लस्टर बम या लैंडमाइंस जैसे घातक हथियार बनाती हैं। जैसे- बोइंग, एयरबस वगैरह को ब्लैकलिस्ट किया गया है।
  • सेहत को नुकसान पहुंचाने वाले उत्पाद जैसे- तंबाकू, गांजा वगैरह बनाती हैं। जैसे- अल्ट्रिया, ब्रिटिश अमेरिकन टोबैको वगैरह पर बैन लगाया है।
  • बाल श्रम करवाती हैं या युद्ध क्षेत्रों में मानवाधिकारों के हनन में शामिल होती हैं।
  • बहुत ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली, जंगल काटने वाली या कोयले पर निर्भर कंपनियों में भी यह फंड पैसा नहीं लगाता।
जून 2025 में कुछ लोगों ने नॉर्जेस बैंक के बाहर प्रदर्शन करके फिलिस्तीन में फंड निवेश न करनी की मांग की थी।

जून 2025 में कुछ लोगों ने नॉर्जेस बैंक के बाहर प्रदर्शन करके फिलिस्तीन में फंड निवेश न करनी की मांग की थी।

इन्हीं नियमों का हवाला देते हुए फंड ने भारत के अडाणी समूह की कुछ कंपनियों में पैसा लगाने पर रोक लगाई है…

  • अडाणी पोर्ट्स, मई 2024: युद्ध में मानवाधिकारों के उल्लंघन का हवाला देते हुए फंड ने इसे ब्लैकलिस्ट कर दिया। म्यांमार में जारी कंपनी के प्रोजेक्ट और वहां की सैन्य सरकार के साथ जुड़ाव से जुड़े विवादों को लेकर ऐसा किया गया।
  • अडाणी ग्रीन, फरवरी 2026: भ्रष्टाचार या वित्तीय गड़बड़ियों का हवाला देकर फंड ने इस कंपनी के सारे शेयर बेच दिए, जो करीब 43.9 मिलियन डॉलर के थे। कहा गया कि अमेरिकी एजेंसियों की ओर से अडाणी ग्रुप पर लगे आरोपों के चलते ऐसा किया गया। हालांकि अब ये आरोप खारिज हो चुके हैं।

जानकारों को उम्मीद है कि पीएम मोदी के न्योते के बाद नॉर्वे की सरकार भारत की ग्रीन एनर्जी कंपनियों में अपना निवेश बढ़ाएगी।

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