चीतों के गले में विशेष सैटेलाइट कॉलर लगाया जाता है। यह GPS तकनीक के जरिए उनकी लोकेशन और मूवमेंट ट्रैक करने में मदद करता है। कॉलर से मिले सिग्नल के आधार पर टीम चीतों की गतिविधियों पर नजर रखती है। 24×7 ग्राउंड मॉनिटरिंग तकनीक के साथ वन विभाग की टीमें भी 24×7 चीतों की निगरानी करती हैं। इन टीमों में वन विभाग के कर्मचारी और सुरक्षा कर्मी शामिल होते हैं, जो शिफ्ट में काम करते हैं। पार्क से बाहर निकलने पर मूवमेंट पर नजर जब कोई चीता कूनो की सीमा से बाहर जाता है, तो कॉलर से मिले सिग्नल के आधार पर उसकी लोकेशन का पता लगाया जाता है। इसके बाद ग्राउंड टीम मौके पर पहुंचकर उसके मूवमेंट और व्यवहार पर नजर रखती है। जरूरत पड़ने पर चीते की सुरक्षा और प्रबंधन के लिए आवश्यक कदम उठाए जाते हैं। ऐसे हुआ था भारत के आखिरी चीतों का शिकार छत्तीसगढ़ के कोरिया महाराज रामानुज प्रताप सिंहदेव शिकार के शौकीन थे। उन्होंने बाघ, तेंदुए, हिरण, चीतल और बारहसिंगा समेत कई वन्यजीवों का शिकार किया था। 1948 में एक रात वे बैकुंठपुर से लगे सलखा गांव के जंगल में शिकार के लिए गए। ग्रामीणों ने बताया था कि इलाके में कोई जंगली जानवर लगातार लोगों पर हमला कर रहा है और लोग डरे हुए थे। इसी दौरान पेड़ों के बीच अचानक आंखें चमकीं। महाराज ने उसी दिशा में एक के बाद एक कई गोलियां चलाईं। कुछ देर बाद वहां जाकर देखा गया तो तीन चीते मृत पड़े थे। तीनों नर थे और पूरी तरह वयस्क नहीं हुए थे। उस दौर की शिकार परंपरा के मुताबिक महाराज ने तीनों चीतों के साथ बंदूक लेकर फोटो खिंचवाई। उनके निजी सचिव ने यह फोटो बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी को भेजी और रिकॉर्ड के लिए बताया कि महाराज ने तीन चीतों का शिकार किया था। इसके बाद देश में चीतों के दिखाई देने का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड सामने नहीं आया। 1952 में भारत सरकार ने देश में चीते विलुप्त घोषित कर दिए। 1972 में चीतों को फिर बसाने की कवायद शुरू हुई भारत में चीतों की वापसी की शुरुआती पहल का श्रेय एमपी कैडर के 1961 बैच के आईएफएस अधिकारी एमके रंजीत सिंह को दिया जाता है। उन्होंने 1972 में भारत में चीतों को फिर बसाने का विचार दिया और प्रोजेक्ट का प्रारंभिक ड्राफ्ट तैयार किया। उस समय ईरान से चीते लाने का समझौता इस शर्त पर हुआ था कि भारत ईरान को एशियाई शेर देगा। हालांकि, यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। 1981 में रंजीत सिंह मध्यप्रदेश लौटे। वन सचिव रहते हुए उन्होंने कूनो के जंगल को सेंक्चुरी बनाने की पहल की। 2008-09 में चीतों को भारत लाने के लिए नए सिरे से प्रोजेक्ट तैयार हुआ। एमके रंजीत सिंह नामीबिया गए और केंद्र सरकार से चर्चा की। इसके बाद केंद्र और राज्य सरकार के बीच नामीबिया से चीते लाने पर सहमति बनी। उस दौरान तत्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने एक कमेटी बनाई। 2010 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 2013 में अदालत ने आदेश दिया कि कूनो में चीतों की जगह एशियाई शेर बसाए जाएं। कमेटी की सिफारिश पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर कर 2013 के आदेश पर पुनर्विचार की मांग की। जनवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने नया आदेश जारी करते हुए कूनो में चीतों को बसाने की अनुमति दे दी।
कूनो के 60 % चीते भारत में जन्मे:नामीबिया से लाए 8 में सिर्फ 3 जिंदा बचे थे, 4 साल में कैसे बदली तस्वीर
चीतों के गले में विशेष सैटेलाइट कॉलर लगाया जाता है। यह GPS तकनीक के जरिए उनकी लोकेशन और मूवमेंट ट्रैक करने में मदद करता है। कॉलर से मिले सिग्नल के आधार पर टीम चीतों की गतिविधियों पर नजर रखती है। 24×7 ग्राउंड मॉनिटरिंग तकनीक के साथ वन विभाग की टीमें भी 24×7 चीतों की निगरानी करती हैं। इन टीमों में वन विभाग के कर्मचारी और सुरक्षा कर्मी शामिल होते हैं, जो शिफ्ट में काम करते हैं। पार्क से बाहर निकलने पर मूवमेंट पर नजर जब कोई चीता कूनो की सीमा से बाहर जाता है, तो कॉलर से मिले सिग्नल के आधार पर उसकी लोकेशन का पता लगाया जाता है। इसके बाद ग्राउंड टीम मौके पर पहुंचकर उसके मूवमेंट और व्यवहार पर नजर रखती है। जरूरत पड़ने पर चीते की सुरक्षा और प्रबंधन के लिए आवश्यक कदम उठाए जाते हैं। ऐसे हुआ था भारत के आखिरी चीतों का शिकार छत्तीसगढ़ के कोरिया महाराज रामानुज प्रताप सिंहदेव शिकार के शौकीन थे। उन्होंने बाघ, तेंदुए, हिरण, चीतल और बारहसिंगा समेत कई वन्यजीवों का शिकार किया था। 1948 में एक रात वे बैकुंठपुर से लगे सलखा गांव के जंगल में शिकार के लिए गए। ग्रामीणों ने बताया था कि इलाके में कोई जंगली जानवर लगातार लोगों पर हमला कर रहा है और लोग डरे हुए थे। इसी दौरान पेड़ों के बीच अचानक आंखें चमकीं। महाराज ने उसी दिशा में एक के बाद एक कई गोलियां चलाईं। कुछ देर बाद वहां जाकर देखा गया तो तीन चीते मृत पड़े थे। तीनों नर थे और पूरी तरह वयस्क नहीं हुए थे। उस दौर की शिकार परंपरा के मुताबिक महाराज ने तीनों चीतों के साथ बंदूक लेकर फोटो खिंचवाई। उनके निजी सचिव ने यह फोटो बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी को भेजी और रिकॉर्ड के लिए बताया कि महाराज ने तीन चीतों का शिकार किया था। इसके बाद देश में चीतों के दिखाई देने का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड सामने नहीं आया। 1952 में भारत सरकार ने देश में चीते विलुप्त घोषित कर दिए। 1972 में चीतों को फिर बसाने की कवायद शुरू हुई भारत में चीतों की वापसी की शुरुआती पहल का श्रेय एमपी कैडर के 1961 बैच के आईएफएस अधिकारी एमके रंजीत सिंह को दिया जाता है। उन्होंने 1972 में भारत में चीतों को फिर बसाने का विचार दिया और प्रोजेक्ट का प्रारंभिक ड्राफ्ट तैयार किया। उस समय ईरान से चीते लाने का समझौता इस शर्त पर हुआ था कि भारत ईरान को एशियाई शेर देगा। हालांकि, यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। 1981 में रंजीत सिंह मध्यप्रदेश लौटे। वन सचिव रहते हुए उन्होंने कूनो के जंगल को सेंक्चुरी बनाने की पहल की। 2008-09 में चीतों को भारत लाने के लिए नए सिरे से प्रोजेक्ट तैयार हुआ। एमके रंजीत सिंह नामीबिया गए और केंद्र सरकार से चर्चा की। इसके बाद केंद्र और राज्य सरकार के बीच नामीबिया से चीते लाने पर सहमति बनी। उस दौरान तत्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने एक कमेटी बनाई। 2010 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 2013 में अदालत ने आदेश दिया कि कूनो में चीतों की जगह एशियाई शेर बसाए जाएं। कमेटी की सिफारिश पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर कर 2013 के आदेश पर पुनर्विचार की मांग की। जनवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने नया आदेश जारी करते हुए कूनो में चीतों को बसाने की अनुमति दे दी।




