Chhattisgarh Naxal Nasbandi Story; Victims Sterilization Reverse Surgery

12 Min Read


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 400 किलोमीटर दूर दंतेवाड़ा का जबेली गांव। यहां कभी नक्सली रहे प्रदीप कुंजम का घर है। उन्होंने मुस्कुराते हुए दरवाजा खोला। गोद में 8 महीने की बेटी करिश्मा थी। प्रदीप 2008 में नक्सली बन गए थे। संगठन का नियम था, शादी क

.

प्रदीप अकेले नहीं है। बीते 10 साल में 56 पूर्व नक्सली ऐसी सर्जरी करा चुके हैं। 26 लोग पिता भी बन गए। बस्तर रेंज के IG सुंदरराज पी. के मुताबिक, 120 पूर्व नक्सलियों की सर्जरी अभी होनी है। ये सरेंडर पॉलिसी का हिस्सा है और फ्री में की जाती है।

30 और 31 मई को जगदलपुर के महारानी अस्पताल में डॉक्टरों ने 33 पूर्व नक्सलियों की सर्जरी की।

30 और 31 मई को जगदलपुर के महारानी अस्पताल में डॉक्टरों ने 33 पूर्व नक्सलियों की सर्जरी की।

पहली कहानी प्रदीप कुंजम की

जख्मी पत्नी को इलाज नहीं मिला, तो संगठन छोड़ा; दूसरी सर्जरी के बाद पिता बने

2008 में प्रदीप के गांव में नक्सली आए थे। उनकी बातों के असर में आकर प्रदीप संगठन से जुड़ गए। वे बताते हैं, ‘संगठन में काम करते हुए मैं गंगू से मिला। हम अक्सर साथ रहते थे। जंगल में राशन ढोना, पानी लाना, खाना बनाना, पहरा देना, सब काम मिलकर करते थे। इसी दौरान एक-दूसरे के करीब आ गए।’

‘कैडर के लोगों ने हमें बात करते देख लिया। खबर बड़े लीडर तक पहुंच गई। उन्होंने मुझसे पूछा, क्या तुम इससे शादी करना चाहते हो? मैंने हां कह दिया। उन्होंने रिश्ता मंजूर कर लिया। शादी की बात आगे बढ़ी, तो कामरेडों ने कहा कि पहले नसबंदी करानी होगी। कैडर की महिलाओं ने गंगू को समझाया कि जंगल की जिंदगी में बच्चे के साथ रहना मुश्किल होगा। अगर किसी मुठभेड़ में फंस गए, तो बच्चे को लेकर भाग नहीं पाओगी। पूरे परिवार की जान खतरे में पड़ जाएगी।’

‘धीरे-धीरे गंगू भी यही बात कहने लगी। आखिरकार मैंने नसबंदी के लिए हामी भर दी। संगठन में कोई डॉक्टर नहीं था। कुछ लोग थे, जो बुखार की दवा देते थे, चोट लगने पर मरहम-पट्टी कर देते थे। उन्होंने ही नसबंदी करना सीख लिया और जंगल में मेरा ऑपरेशन किया।’

‘मई 2016 में मैंने गंगू से शादी कर ली। करीब एक महीने बाद मुठभेड़ में गंगू जख्मी हो गई। तीन साथी मारे गए। घायल होने के बाद भी गंगू सामान उठाकर पहाड़ चढ़ती थी। उसकी हालत बिगड़ने लगी। मैंने कई बार अपने नेताओं से कहा कि किसी डॉक्टर को बुला लें, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया।’

प्रदीप ये किस्सा सुना ही रहे थे कि बगल में बैठीं गंगू स्थानीय भाषा में कुछ कहने लगीं। हमने प्रदीप से पूछा कि वे क्या कह रही हैं? प्रदीप ने उनकी बात का मतलब बताया, ‘ये कह रही है कि घायल होने के बाद भी तैरकर नदियां पार करनी पड़ती थीं। भीगे कपड़े शरीर पर ही सूख जाते, जिससे घाव और गहरा हो जाता था। रात में दवाइयां दी जाती थीं, लेकिन उनका असर नहीं होता था।’

हमने गंगू से बात करने की कोशिश की, लेकिन वे उठकर चली गईं। प्रदीप ने पहले ही कहा था कि पत्नी के वीडियो न बनाएं। इसलिए हमने जोर नहीं दिया।

फोटो में प्रदीप पत्नी गंगू के साथ हैं। उन्होंने पत्नी की फोटो-वीडियो न दिखाने की गुजारिश की थी, इसलिए फोटो ब्लर की गई है।

फोटो में प्रदीप पत्नी गंगू के साथ हैं। उन्होंने पत्नी की फोटो-वीडियो न दिखाने की गुजारिश की थी, इसलिए फोटो ब्लर की गई है।

प्रदीप आगे कहते हैं, ‘उसी वक्त मैंने सोचा कि जिस संगठन के लिए हमने सब छोड़ दिया, वह अपने लोगों का इलाज तक नहीं करा सकता। तय कर लिया कि अब यहां नहीं रहना है।’

पहली सर्जरी रायपुर में, दूसरी तेलंगाना में

प्रदीप बताते हैं, ‘मैंने 2022 में दंतेवाड़ा में सरेंडर कर दिया। तब एसपी अभिषेक पल्लव थे। मैंने उन्हें नसबंदी के बारे में बताया। उन्होंने मुझे रायपुर के रामकृष्ण अस्पताल भेजा। वहां ऑपरेशन हुआ, लेकिन कामयाब नहीं हुआ। मुझे पता चला कि तेलंगाना के वारंगल में भी नसबंदी रिवर्स करने के लिए ऑपरेशन होता है। मैं वारंगल गया और दूसरी बार ऑपरेशन कराया। इस बार सर्जरी कामयाब रही। मैं 2025 में पिता बन गया।’

दूसरी कहानी दिनेश कड़ती की

सोचा था जंगल में ही मरेंगे, गांव में बच्चों को देखकर पिता बनने की इच्छा हुई

दिनेश दंतेवाड़ा के मुंगेर गांव में रहते थे। 2005 में उन्होंने नक्सल संगठन जॉइन कर लिया। 2012 में सरेंडर किया, तब डिप्टी कमांडर बन चुके थे। 3 लाख रुपए के इनामी थे।

दिनेश बताते हैं, ‘मैं संगठन में नया था। तभी एक लड़की भी आई। उसका नाम मीना था। वो मुझे पसंद थी। मैंने उसे प्यार के इजहार वाला लेटर भेजा। मीना की तरफ से जवाब नहीं आया। फिर दूसरा लेटर लिखा और पूछा क्या आप नाराज हो? इस बार उसने जवाब दिया और मेरा प्रपोजल मान लिया।’

QuoteImage

2007 में हमने शादी के बारे में सोचा। हमें नहीं पता था कि शादी से पहले नसबंदी कराना पड़ता है। मैंने यह बात मीना को बताई, तो उसने कहा कि हम यहीं मिले हैं, यहीं रहेंगे और शायद यहीं मरेंगे, इसलिए नसबंदी करा लो। मैंने 2008 में नसबंदी करा ली।

QuoteImage

दिनेश आगे बताते हैं, ‘समय के साथ मेरे भीतर पिता बनने की इच्छा जागने लगी। मैं किसी गांव में जाता और छोटे बच्चों को खेलते देखता, तो सोचता था कि मैं कभी बाप नहीं बन पाऊंगा। मीना भी मां बनना चाहती थी, लेकिन संगठन छोड़ने से डरती थी। मैं उससे पूछता था कि अगर परिवार ही नहीं होगा, तो यह लड़ाई किसके लिए लड़ रहे हैं।’

‘हमने 2012 में दंतेवाड़ा में सरेंडर कर दिया। मैंने अफसरों को नसबंदी के बारे में बताया। कहा कि मैं परिवार बढ़ाना चाहता हूं। उन्होंने मेरी मदद की। अभी मेरा पांच साल का बेटा है।’

दिनेश के घर की दीवार पर उनकी ये फैमिली फोटो टंगी है। तब बेटा गोद में था, अब उसकी उम्र 5 साल हो गई है।

दिनेश के घर की दीवार पर उनकी ये फैमिली फोटो टंगी है। तब बेटा गोद में था, अब उसकी उम्र 5 साल हो गई है।

तीसरी कहानी योगेश माड़वी की

एक थप्पड़ ने नक्सली बनाया, बेटे को देखकर लगता है जिंदगी ने दूसरा मौका दे दिया

सुकमा के चिंतलनार गांव के योगेश माड़वी के नक्सली बनने की कहानी एक थप्पड़ से शुरू हुई थी। 1996 में उनके मामा जंगल में जमीन जोत रहे थे। तभी फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के अधिकारी आए और उन्हें रोकने लगे। एक अधिकारी ने मामा को थप्पड़ मार दिया। यह बात नक्सलियों तक पहुंची, तो उन्होंने अधिकारी को धमकाया।

योगेश कहते हैं कि इसके बाद वह अधिकारी दोबारा हमारे इलाके में नहीं आया। तभी मुझे लगा कि नक्सली ही आदिवासियों के साथ हैं। 1998 में मैं उनसे जुड़ गया। शुरुआत स्टूडेंट विंग से हुई। धीरे-धीरे रीजनल कमेटी का मेंबर बन गया। हिडमा जैसे बड़े नक्सली नेताओं के साथ काम करने लगा।

योगेश आगे बताते हैं, ‘संगठन में शामिल होने के कुछ समय बाद मुझे कैडर में शामिल अनीता पसंद आ गई। मैंने उसे चिट्ठी लिखी कि मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं। उसने हां कह दिया, लेकिन पूछा कि क्या नसबंदी कराओगे? पहले मैं इसके लिए तैयार नहीं था, लेकिन कामरेड दबाव बनाने लगे। आखिरकार मैं मान गया। 2007 में पश्चिम बंगाल से आए एक डॉक्टर ने मेरी नसबंदी कर दी।’

‘समय के साथ संगठन से मेरा भरोसा उठने लगा। गुटबाजी बढ़ रही थी। कई लोगों को सिर्फ शक के आधार पर पुलिस का मुखबिर बताकर मार दिया गया। तब पहली बार लगा कि हम जिस लड़ाई का हिस्सा हैं, उसमें कहीं न कहीं बड़ी गलती हो रही है।’

‘2011 में मैंने तय किया कि अब संगठन के साथ नहीं रहूंगा। मुझे डर था कि अगर पुलिस के पास गया तो वे नक्सली समझकर मार देंगे। संगठन को पता चल गया तो वे भी नहीं छोड़ेंगे। मैंने पत्नी के इलाज का बहाना बनाया। मेरी सुरक्षा में पांच गनमैन थे। उनके साथ तेलंगाना बॉर्डर तक गया। फिर उन्हें यह कहकर वापस भेज दिया कि इलाज कराकर लौट आऊंगा।’

‘तेलंगाना में एक सरपंच मुझे पहचानता था। उसकी मदद से मैं करीमनगर पहुंचा और सरेंडर कर दिया। नसबंदी खुलवाने के लिए सर्जरी करवाई। मेरा एक बेटा है। उसे देखकर लगता है कि जिंदगी ने मुझे दूसरा मौका दिया है।’

फोटो में योगेश के साथ उनकी पत्नी अनीता है। गोद में बेटा है, जिसकी उम्र अब 5 साल हो गई है।

फोटो में योगेश के साथ उनकी पत्नी अनीता है। गोद में बेटा है, जिसकी उम्र अब 5 साल हो गई है।

नसबंदी की रिवर्स सर्जरी कामयाब होने के चांस 30 से 70%

पूर्व नक्सली सर्जरी के लिए जगदलपुर के महारानी अस्पताल पहुंच रहे हैं। अस्पताल के मुख्य अधीक्षक डॉ. संजय कुमार प्रसाद बताते हैं, ‘कई पूर्व नक्सलियों की नसबंदी प्रशिक्षित डॉक्टरों ने नहीं की थी। कुछ मामलों में ऑपरेशन के दौरान ऐसी नसें भी कट गईं, जिन्हें दोबारा जोड़ना मुमकिन नहीं है।’

सरेंडर पॉलिसी में नसबंदी की रिवर्स सर्जरी कराने का वादा

बस्तर डिवीजन के IG सुंदरराज पी. कहते हैं, ‘हाल के कुछ साल में 1 हजार से ज्यादा नक्सलियों ने सरेंडर किया है। उसमें से ज्यादातर ने यही कहा कि संगठन में उनकी नसबंदी हो गई है, लेकिन वे परिवार बढ़ाना चाहते हैं। हमने फैसला लिया कि सभी का टेस्ट कर नसबंदी खुलवाई जाएगी।’

भारत में नक्सलवाद की स्थिति इस ग्राफिक से समझिए…

…………………….

ये ग्राउंड रिपोर्ट भी पढ़ें

आर्मी के साथ आतंकियों से लड़े, सरकार ने घर उजाड़ा, मंत्री बोले- पता नहीं किसने आदेश दिया

80 साल के अब्दुल रज्जाक अपने टूटे घर के मलबे के पास उदास बैठे रहते हैं। 2001 में वे कश्मीर से भागकर जम्मू आए थे। सिधरा एरिया में घर बनाया। 25 साल हो गए रहते हुए। 19 मई को वन विभाग वाले बुलडोजर लेकर आए और अब्दुल समेत करीब 25 घर तोड़ दिए। ये दूसरी बार है, जब अब्दुल बेघर हुए हैं। इससे पहले आतंकियों के डर से घर छोड़ा था। हालांकि मंत्री जावेद राणा ने हैरानी जताई है कि ये कार्रवाई सरकार की जानकारी के बिना की गई। पढ़ें पूरी खबर…



Source link

Share This Article
Leave a Comment