नई दिल्ली: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने शनिवार को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बोलते हुए कहा कि संरक्षण और विकास में टकराव नहीं, बल्कि दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज अदालतों के सामने सवाल यह नहीं है कि संरक्षण या विकास में क्या चुनाव करें, बल्कि सवाल यह है कि दोनों को कैसे साथ चलाया जाए और लंबे समय तक कायम रखा जाए।
CJI ने सुप्रीम कोर्ट को पर्यावरण न्याय का ‘बरगद का पेड़’ बुलाया और कहा कि अदालत ने चार दशकों में पर्यावरण कानून को मजबूत किया है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 48A और 51A का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल संवैधानिक प्रावधान काफी नहीं हैं और न्यायिक समझ की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यक्रम के दौरान NGT मोबाइल ऐप का लॉन्च किया। CJI ने ‘इको-सेंट्रिक प्रोपोर्शनैलिटी’ के विचार का भी जिक्र करते हुए कहा कि इससे सोच में बड़ा बदलाव आया है और अब विकास की अनुमति विशेषज्ञों की निगरानी, बहाली और क्षतिपूरक वनीकरण के साथ दी जा सकती है।
उन्होंने पर्यावरण अधिकारों से जलवायु संबंधी अधिकारों की ओर बढ़ने के बदलाव पर भी बात कही और कहा कि जलवायु परिवर्तन के बुरे असर से समानता, आजीविका और स्वास्थ्य प्रभावित हो सकते हैं। CJI ने जोर देते हुए कहा, ‘नदी प्रशासनिक सीमाओं के हिसाब से प्रदूषण का अनुभव नहीं करती और वायुमंडल राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं मानता।’
NGT के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का नुकसान और प्रदूषण राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं मानते और इनका असर सबसे ज्यादा उन लोगों पर पड़ता है जो इसके लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण न्याय अदालत की संभावना पर चर्चा करते हुए कहा कि कोई भी देश जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से अकेले नहीं निपट सकता।
इस सम्मेलन में 17 देशों के न्यायिक प्रतिनिधि, पर्यावरण विशेषज्ञ, सरकारी अधिकारी और विभिन्न पक्षों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इसका उद्देश्य पर्यावरण, विकास और न्याय को जोड़कर वैश्विक संवाद का मंच तैयार करना और टिकाऊ भविष्य के लिए न्यायिक, वैज्ञानिक और नीतिगत समाधान खोजना है।













