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साइकिल की चेन, छर्रे से बनाई मां-बेटे की मूर्ति: नट-बोल्ट और सिक्कों का श्रृंगार; बस्तर पंडुम में ग्रामीण दिनचर्या को मूर्ति में उकेरा – Chhattisgarh News


बस्तर पंडुम में एक कलाकार की बनाई 2 मूर्तियां लोगों को आकर्षित कर रही हैं।

बस्तर पंडुम अंदरूनी इलाकों के कलाकारों के लिए बेहतरीन प्लेटफॉर्म बन रहा है। यहां एक कलाकार की बनाई 2 मूर्तियां भी लोगों को आकर्षित कर रहीं हैं। लोहे के छर्रे, साइकिल की चेन, नट-बोल्ट जैसी चीजों से 60 साल के बुजुर्ग ने मां-बेटे की मूर्ति बना दी।

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सुकमा के बुजुर्ग ने करीब 3 महीने की कड़ी मेहनत से इन दोनों मूर्तियों को बनाया है। बस्तर पंडुम में केंद्रीय गृहमंत्री 5 अप्रैल को शिरकत करेंगे। ऐसे में इस बुजुर्ग कलाकार की चाहत है कि वे शाह को अपनी कला के बारे में बता सकें।

मूर्ति का अलग-अलग हिस्सा अलग-अलग चीजों से बना

  • साइकिल की चेन से बाल
  • एक-एक छर्रा जोड़कर चेहरा
  • नट-बोल्ट से शरीर और साड़ी

बस्तर पंडुम में मां-बेटे की मूर्ति लोगों को काफी आकर्षित कर रही है।

साइकिल की चेन, नट-बोल्ट से ग्रामीण अंचल में रहने वाली महिला की मूर्ति बनाई गई।

मां-बेटे की मूर्ति बनाने वाले मूर्तिकार लुन्दू बघेल नक्सल प्रभावित छिंदगढ़ के रहने वाले हैं।

नहीं ली कोई ट्रेनिंग, खुद से सीखी कला

60 साल के इस मूर्तिकार का नाम लुन्दू बघेल है। वे सुकमा जिले के नक्सल प्रभावित छिंदगढ़ के रहने वाले हैं। उन्होंने बिना किसी ट्रेनिंग के सिर्फ अपने टैलेंट के दम पर खूबसूरत मूर्ति बनाई है। उन्होंने साइकिल की खराब चेन, साइकिल दुकान में ही खराब पड़े लोहे के छर्रे और नट-बोल्ट को इकट्ठा किया।

ये सामान दुकान संचालक के लिए बेकार थे। जिसे वह फेंक रहा था। अब बुजुर्ग ने इन्हीं वेस्ट सामान का इस्तेमाल मूर्ति बनाने के लिए किया। साथ ही इसमें पेड़ों से निकलने वाले गोंद का इस्तेमाल किया गया है। इसी से नट-बोल्ट को चिपकाया गया।

कैसे मिली मूर्ति बनाने की प्रेरणा

लुन्दू ने कहा कि, बस्तर में महिलाओं के श्रृंगार के आभूषण बहुत प्रचलित हैं। साथ ही महिलाओं को श्रृंगार का बड़ा शौक रहता है। अभी महुआ, इमली और टोरा का सीजन है। महिलाएं अपने बच्चे और अपने परिवार के साथ सुबह-सुबह जंगलों में वनोपज एकत्रित करने जाती हैं। रोज की दिनचर्या से ही मूर्ति बनाने की प्रेरणा मिली।

श्रृंगार और साड़ी बनाने में लगा ज्यादा सामान

लुन्दू ने मां और बेटे के प्यार और दिनचर्या को ही मूर्ति के रूप में उकेरा। यदि किसी महिला की मूर्ति बनानी हो तो साड़ी, श्रृंगार, बाल, समेत अन्य चीजों का भी ध्यान रखना होता है। अगर ये सब लोहे, चेन, सिक्कों और नट-बोल्ट से बनाया जाए तो और ज्यादा ध्यान और समय लगता है।

इन मूर्तियों के देखने बस्तर पंडुम में कई लोग स्टॉल पर जुट रहे हैं।

कागज से ढांचा तैयार किया

वहीं बच्चे की मूर्ति के लिए पहले कागज से ढांचा तैयार किया। गोंद की एक मोटी परत चढ़ाई। साथ ही ब्रॉउन रंग का पेंट किया और मूर्ति तैयार की। लुन्दू के हाथों की कला मूर्तियों की फिनिशिंग में दिख रही है। इन मूर्तियों को बनाने में किसी भी तरह की मशीन या फिर आधुनिक यंत्रों का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

बेचने के लिए ये रखी कीमत

लुन्दू का कहना है कि वो किसान है। पिछले 10 सालों से शौकिया तौर पर मूर्तियां बना रहा है। मां-बेटे की ये मूर्ति उसकी अब तक की बनाई गई मूर्तियों में सबसे बेस्ट है। फिलहाल इसे बेचने का कोई इरादा नहीं है। हां, अगर एक-एक मूर्ति के 20-30 हजार रुपए मिलते हैं तो बेचने के लिए सोच सकता है।

सिक्कों से किया गया है श्रृंगार

अमित शाह को दिखाऊंगा कला- कलाकार

लुन्दू का कहना है कि बस्तर पंडुम कार्यक्रम में अपनी कला का प्रदर्शन किया हूं। अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस कार्यक्रम में शामिल होने आएंगे। वे मेरे स्टॉल पर आते हैं तो उन्हें अपनी कला दिखाऊंगा। उनसे कहूंगा कि बस्तर के ग्रामीणों के पास भी टैलेंट की कमी नहीं है।

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