बेगूसराय के किसान गेहूं, मक्का की खेती कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि पारंपरिक खेती से एक सीजन में हर एकड़ मुश्किल से 30 हजार रुपए तक की बचत होती थी, लेकिन अब स्ट्रॉबेरी से हर महीने एक लाख रुपए की बचत हो रही है। कुछ किसानों का कहना है कि ये हमारी
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यहां के किसान अपने खेत में उपजाया गया स्ट्रॉबेरी न सिर्फ सस्ते में स्थानीय लोगों को उपलब्ध करा रहे हैं, बल्कि यह पटना से लेकर सिलिगुड़ी तक के बाजार में बिक रहा है। जब अच्छी उपज और आमदनी हो रही है तो अन्य किसान भी इससे प्रेरित होने लगे हैं। उम्मीद है कि इस साल से बेगूसराय में स्ट्रॉबेरी की खेती का आंकड़ा दोगुना होता जाएगा।
स्ट्रॉबेरी की फसल।
‘यूट्यूब देखकर स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए प्रेरित हुआ’
वीरपुर प्रखंड क्षेत्र के परवंदा गांव के रहने वाले किसान राजेश कुमार महतो कहते हैं कि हम यूट्यूब पर देखकर स्ट्रॉबेरी की खेती करने के लिए प्रेरित हुए। जिला के कृषि विभाग के पदाधिकारी के प्रोत्साहन पर इसकी खेती शुरू की। ठंड के मौसम में फसल लगाई है। अधिकारियों का कहना था कि फरवरी में फसल खत्म हो जाएगी, लेकिन हम अंतिम अप्रैल तक ले जाएंगे। शेड नेट लगा दिया जाए तो भीषण गर्मी में भी यह फल देगा। दो एकड़ में 10 अक्टूबर को लगाए थे, एक लाख रुपए खर्च हुए। सरकारी फंडिंग से मल्चिंग, ड्रिपिंग और बीज अनुदान पर उपलब्ध कराया गया।
अभी तक 6 लाख का बेच चुके हैं, हमारे इलाके में 25 किसानों का क्लस्टर बनाकर 25 एकड़ में खेती कराई गई थी। कुछ किसान समय पर ड्रिपिंग और रसायन नहीं दे सके, जिसके कारण पौधा ग्रोथ नहीं कर सका।
पहले गेहूं, मक्का, प्याज, आलू आदि की खेती करते थे। पहली बार स्ट्रॉबेरी लगाया, विजन है कि स्ट्रॉबेरी महाराष्ट्र के लोग उपजा सकते हैं तो बिहार के लोग क्यों नहीं उपजा सकते और यही सोचकर जब परिश्रम किया तो उसका फल भी मिला। एक एकड़ में गेहूं और मक्का लगाने पर 20 हजार से अधिक बचत नहीं होता था।
स्ट्रॉबेरी के कार्टन तैयार करते किसान।
‘सरकार स्थानीय बाजार उपलब्ध कराए तो और बचत होगी’
किसान का कहना है कि सरकार स्थानीय बाजार उपलब्ध करा दे, प्रोसेसिंग यूनिट लगा दे तो और बचत होगा। होली में स्ट्रॉबेरी का स्टॉक बच गया तो 60 किलो जैम बनाए, लेकिन जैम का कोई ब्रांड नहीं है तो नहीं बिकेगा। 10 मजदूर लगातार काम कर रहे हैं। पक्षी से बचने के लिए कुछ नेट लगाया गया है। खेती में घाटा नहीं होता है, सरकार मदद कर रही है, किसानों को उसके अनुसार चलना चाहिए।
किसान प्रैक्टिकल में नहीं आ रहे हैं। सरकार ड्रिप लगाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है, उसमें जरूरत के अनुसार पौधा को पानी और हवा मिलेगी। पानी में 50 प्रतिशत की बचत होगी, ऐसे ही अलग खेती करके किसान अपनी बचत बढ़ा सकते हैं।
ड्रीप से न केवल जरूरत के अनुसार पानी मिलता है, बल्कि इससे पौधा में चार गुना अधिक वृद्धि होती है। हम स्ट्रॉबेरी तुड़वा कर एक डब्बा में पैक करते हैं, आठ पैकेट का एक कार्टन बनाकर सिलीगुड़ी भेज रहे हैं।
‘लोकल मार्केट में एक कार्टन स्ट्रॉबेरी 150, सिलिगुडी में 300 रुपए का’
जो कार्टन यहां 150 रुपए में बिकता है, वह सिलिगुडी में 300 रुपए में बिक रहा है, किराया मात्र 20 रुपए पड़ता है। पैकिंग बिहार सरकार के उद्यान विभाग ने उपलब्ध कराया है, उस पर बिहार सरकार का लोगो लगा हुआ है। हमें नर्सरी में सही बीज नहीं दिया गया, गलत भेज दे दिया, जिससे उपज कुछ कम हुई है। चकला वाला देता तो इसे भी दोगुनी बचत होती। एक बीघा में 10 लाख तक का उपज हो सकता है। फंगस ज्यादा लगता है तो ड्रिप से ही फंगीसाइड देते हैं। इसके अलावा कोई केमिकल या खाद नहीं देते हैं।
अभी 2 क्विंटल रोज तोड़ रहे हैं। हमने स्ट्रॉबेरी को बेगूसराय में घर-घर पहुंचने का लक्ष्य रखा है जो स्ट्रॉबेरी पहले 200 रुपए में मिलता था, वह 100 रुपए में मिल रहा है। लोकल में कम रेट मिलता है, फिर भी सभी खर्च काट कर एक लाख रुपए महीना बच रहा है। हम तो किसानों को कहते हैं कि स्ट्रॉबेरी खूब लगाइए, बीज बाहर से मंगवाइए। मजदूर को अपने गांव-घर में मजदूरी दीजिए, वह बाहर नहीं जाएंगे, उनका शोषण नहीं होगा।
प्लास्टिक के डिब्बे में पैक किया जा रहा स्ट्रॉबेरी।
बागवानी कलेक्टर स्कीम से 25 एकड़ में लगाई स्ट्रॉबेरी की फसल
सहायक निदेशक (उद्यान) अनिल कुमार बताते हैं कि बागवानी कलेक्टर स्कीम से 25 एकड़ में स्ट्रॉबेरी लगाया गया है। स्ट्रॉबेरी कि खेती के लिए किसानों को प्रति एकड़ 2 लाख रुपए 2 इंस्टॉलेशन में दिया जाता है। किसान काफी उत्साहित हैं, क्योंकि उन्हें प्रति एकड़ 10 लाख रुपए की आमदनी मात्र एक फसल में हो रही है।
पूरा बिकने के बाद मुनाफा और बढ़ेगा। सब फलों में कम समय स्ट्रॉबेरी में लगता है, यह किसानों के लिए बहुत फायदेमंद है। जागरूकता से लग रहा है कि अगले साल और अधिक किसान लगाएंगे। 60 एकड़ तक में इसकी खेती होगी।