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गुजरात के वाडिया गांव में बाल सगाई से देह व्यापार रोकने की कोशिश, 7 साल में सगाई 18 में शादी

गुजरात के बनासकांठा जिले के वाडिया गांव में बेटियों को देह व्यापार से बचाने के लिए कम उम्र में सगाई कराई जा रही है। न्यूज एजेंसी PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, यहां के पीढ़ीगत घुमंतू समुदाय की महिलाओं को देह व्यापार में धकेला जाता रहा है। गांव के पुरुष दलाल ग्राहकों की तलाश करते हैं […]
गुजरात के वाडिया गांव में बाल सगाई से देह व्यापार रोकने की कोशिश, 7 साल में सगाई 18 में शादी
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गुजरात के बनासकांठा जिले के वाडिया गांव में बेटियों को देह व्यापार से बचाने के लिए कम उम्र में सगाई कराई जा रही है। न्यूज एजेंसी PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, यहां के पीढ़ीगत घुमंतू समुदाय की महिलाओं को देह व्यापार में धकेला जाता रहा है। गांव के पुरुष दलाल ग्राहकों की तलाश करते हैं और हर सुबह पालनपुर-थराद हाईवे पर ट्रक ड्राइवरों और आसपास के गांवों के पुरुषों से संपर्क करते हैं।

वाडिया गांव अहमदाबाद से करीब 200 किलोमीटर दूर है और यहां करीब 750 लोग रहते हैं, जिनमें लगभग 350 महिलाएं हैं। गांव वालों का कहना है कि सगाई या शादी हो जाने के बाद लड़कियों को देह व्यापार में नहीं धकेला जाता। कम उम्र की सगाई को वे बेटियों को गांव से बाहर सम्मानजनक जिंदगी देने का रास्ता मानते हैं। देह व्यापार से बचने के लिए सगाई भारत में बाल विवाह पर रोक है, फिर भी वाडिया में इसे लड़कियों को बचाने का उपाय माना जाता है।

गांव की 19 साल की एक लड़की इस संघर्ष की मिसाल है। उसकी मां और दादी दोनों देह व्यापार में थीं। उसने PTI को पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया, “मैंने देखा कि मेरे पिता और चाचा मेरी मां और दादी के लिए ग्राहकों को लाते थे।” उसने कहा, “जब वे ग्राहकों की जरूरत पूरी करने की स्थिति में नहीं रहीं, तब यह सिलसिला बंद हुआ। मेरी मां ने बताया कि उन्हें जबरन इसमें नहीं धकेला गया था।” उसके मुताबिक, गरीबी के कारण गांव में सब इसे सामान्य मानते थे। उसकी मां को यह भी पक्का पता नहीं था कि उसके जैविक पिता कौन हैं। लड़की ने कहा, “मेरी मां ने तय किया कि वह मुझे इस धंधे में नहीं जाने देंगी। 11 साल की उम्र में सामूहिक समारोह में मेरी सगाई हुई और 18 साल में शादी।”

वाडिया में बदलाव की कोशिश पितृसत्तात्मक व्यवस्था के बीच हो रही है। कई परिवारों के लिए बाल सगाई ही बेटियों को इस धंधे से दूर रखने का एकमात्र रास्ता है। गांव में निगरानी और नियम समाजसेवियों और कुछ परिवारों की मदद से आसपास के गांवों या रिश्तेदारों के परिवारों में लड़कियों की औपचारिक सगाई कराई जाती है। इन लड़कियों की उम्र 7 से 12 साल तक होती है। गांव वालों ने आपसी सहमति से एक अनलिखा नियम बनाया है कि सगाई या शादी हो चुकी लड़कियों को देह व्यापार में नहीं धकेला जाएगा। गांव में आने वाले लोगों पर भी नजर रखी जाती है।

चंद्रा सरानिया ने बताया कि जब वह अपनी बेटी की शादी करना चाहती थीं, तो लोगों ने उन्हें इसे लड़कियों की किस्मत मानने को कहा। उन्होंने कहा, “मुझसे कहा गया कि विद्रोह मत करो और यहां की लड़कियों की किस्मत स्वीकार कर लो। मैंने अपनी बेटी की 12 साल में सगाई और 18 साल में शादी कराई।” उन्होंने बताया कि सगाई पक्की करने के लिए लड़के के परिवार ने 1 रुपए और बेटी को कुछ कपड़े दिए थे। चंद्रा को 15 साल की उम्र में देह व्यापार में धकेला गया था। अब वह छोटी डेयरी चलाती हैं। सरकार ने 1963 में उनके परिवार को खेती की जमीन दी थी, लेकिन गांव में सिंचाई की सुविधा नहीं थी। इसी वजह से उन्हें देह व्यापार में जाना पड़ा। चंद्रा ने देह व्यापार से हुई कमाई से तीन बच्चों का पालन-पोषण किया।

रमेशभाई सरानिया की दो बेटियां हैं। उन्होंने एक की सगाई 8 साल और दूसरी की 11 साल की उम्र में कराई। उन्होंने बताया कि दोनों बेटियों की अब शादी हो चुकी है और दोनों ने अपनी स्कूली पढ़ाई भी पूरी की है। रमेशभाई ने कहा, “मैंने अपने भाई से भी झगड़ा किया, ताकि उसकी बेटियां इस धंधे में न जाएं।” उन्होंने बताया कि गांव के नाम से जुड़े कलंक के कारण आज भी उनकी बेटियों के लिए दूल्हा तलाशना मुश्किल होता है।

2012 से सामूहिक शादी और सगाई की पहल शुरू हुई। गैर-सरकारी संगठन विचरता समुदाय समर्थन मंच (VSSM) की संस्थापक मित्तल पटेल ने कहा कि इससे कई लड़कियों को जबरन देह व्यापार से बचाया गया। पटेल ने कहा, “परिवारों को बेटियों को इस धंधे में भेजने से रोकना आसान नहीं था। हमें छिपकर साहूकार बने घूमने वाले दलालों का सामना करना पड़ा।” उन्होंने कहा, “समाज को इस गलत प्रथा के बारे में जागरूक किया गया। माता-पिता से बच्चों को पढ़ाने की अपील की गई।” पटेल ने बताया कि गांव में पहली सामूहिक शादी कराई गई और 160 में से 90 परिवारों को यह धंधा छोड़ने के लिए तैयार किया गया। उन्होंने कहा, “बदलाव आसान नहीं था। लेकिन लड़कियों को इस धंधे से बचाने के लिए लगातार काम करना पड़ा।”

पटेल के मुताबिक, सगाई होने के बाद लड़के का परिवार भी लड़की की सुरक्षा को लेकर जिम्मेदारी लेने लगता है। उन्होंने बताया कि बोरवेल और तालाबों को फिर से उपयोगी बनाने, खेती की जमीन को सुधारने और परिवारों को बिना ब्याज कर्ज देने जैसे काम किए गए। इन कर्जों से परिवारों को अपना कारोबार शुरू करने में मदद मिली। इन प्रयासों का मकसद 12-13 साल की लड़कियों को देह व्यापार में धकेले जाने से रोकना है। पटेल ने कहा कि कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बाल विवाह को बढ़ावा देने को लेकर चिंता जताई है, लेकिन उनका मानना है कि बाल सगाई देह व्यापार से बेहतर है।

वाडिया के नाम से जुड़ा पुराना कलंक लोककथाओं के मुताबिक, सरानिया समुदाय एक घुमंतू जनजाति है जो कभी मेवाड़ के महाराणा प्रताप की सेना के साथ घूमती थी। पुरुष ढाल और तलवार जैसे हथियारों को धार देते थे और महिलाएं सैनिकों का मनोरंजन करती थीं। 1947 में भारत की आजादी के बाद इस समुदाय के पास काम नहीं रहा और आजीविका के विकल्प न होने पर वे फिर देह व्यापार की ओर लौट गए। वाडिया के लोग आज भी इस अतीत से जूझ रहे हैं और गांव से जुड़े ‘वेश्याओं के गांव’ के टैग को हटाने की कोशिश कर रहे हैं।

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