संडे जज्बात-हम अधेड़ कुंवारे कौवों जैसे अपशकुन माने जाते हैं:सरकार हमें देती है पेंशन, जाने कितने जानवरों से रेप करते पकड़े गए

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लोग मुझे मेरे नाम से कम, रं@#% कहकर ज्यादा बुलाते हैं। मुझे शुभ कामों से दूर रखा जाता है। गलती से पहुंच जाऊं तो लोगों का चेहरा उतर जाता है। मैं वीरेंद्र दून। हरियाणा के जिला हांसी के गांव पेटवाड़ का रहने वाला हूं। मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी कमी है कि 46 साल का होने के बावजूद मेरी शादी नहीं हुई। इसलिए लोग मुझे रं@#% रं@#% कहकर पुकारते हैं। गांव और रिश्तेदारी में शादी-ब्याह हो, तो लोग मुझे बुलाते तो जरूर हैं, लेकिन काम करवाने के लिए- कुर्सियां लगाने, पानी भरवाने, टेंट संभालने के लिए। घर में हवन हो तो कह दिया जाता है- तू यहां से हट जा, जोड़ा बैठेगा। इस व्यवहार की इतनी आदत हो चुकी है कि कोई इज्जत दे तो अजीब लगता है। मैं अकेला नहीं हूं। हरियाणा में बच्चियों को गर्भ में मारने की वजह से हजारों पुरुष हैं, जो कुंवारे रह गए हैं। शादी न होने से कई तो शराब में डूब गए, कइयों ने जान तक दे दी। ऐसे ही लोगों के बीच से निकला है हमारा एक संगठन- ‘कुंवारे मर्दों की यूनियन’ दरअसल, मैं और मेरा दोस्त सीलू सांगवान साथ-साथ बड़े हुए। सीलू 45 साल का है और मैं 46 साल का। हम दोनों ने 12वीं तक पढ़ाई साथ की है। उस समय जिंदगी बहुत सीधी लगती थी। न कोई चिंता थी, न कोई सवाल। सोचते थे, बड़े होंगे, कमाएंगे और अपना घर बसाएंगे। हालांकि, किस्मत ने हमारे लिए कुछ और ही तय कर रखा था। जब शादी की उम्र हुई तो घर वालों ने कई जगह रिश्ते की बात चलाई, लेकिन हर बार कोई न कोई कमी निकाल दी जाती थी। सबसे बड़ी कमी यही बताई जाती थी कि मेरे पास जमीन कम है और कोई पक्की नौकरी भी नहीं है। धीरे-धीरे साल गुजरते गए। बहुत कोशिशों के बाद भी मेरी शादी नहीं हो पाई। मैं कुंवारा रह गया। जब 30 साल का हुआ, तब दिल्ली में पीएसओ यानी पर्सनल सिक्योरिटी ऑफिसर की नौकरी मिली। सोचा था कि अब शायद शादी हो जाएगी, और अगर नहीं भी हुई तो कम से कम जिंदगी अच्छे से कट जाएगी। नौकरी करते एक साल भी नहीं बीता, मैं फिर बेरोजगार हो गया। वजह पता चली तो सन्न रह गया। मुझे अपशकुन माना गया, क्योंकि कुंवारा था। इसके बाद फरीदाबाद गया। जैसे-तैसे फिर नौकरी मिली। धीरे-धीरे वहां भी सभी को पता चल गया कि मेरी शादी नहीं हो रही है। लोग कहने लगे कि दूसरों की बहन-बेटियों पर गलत नजर डालेगा, इसलिए इसे हटा दो। आखिरकार यही वजह बताते हुए मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। वे बातें मुझे अंदर तक चुभ गईं। कई रात तो मैं सो नहीं पाया। तब तक 38 साल का हो चुका था। शादी की कोशिशें तब तक भी चल रही थीं, लेकिन कहीं बात नहीं बनी। कई महीनों तक नौकरी के लिए भटकता रहा, आखिरकार गांव लौट आया। यहीं खेती करने लगा। फिर गांव में भी यही सब होने लगा। लोगों की नजरें, ताने और तरह-तरह की फुसफुसाहटें सुनने को मिलती। किसी बात पर चर्चा होती। अगर मैं कोई मशविरा देता, तो उसे सुना नहीं जाता। लोग बीच में ही रोक देते। कहते- ‘तू रं@#%है, तुझे क्या पता?’ यही नहीं अपने घर में भी तवज्जो नहीं मिलती थी। मेरे कहने पर कोई फसल बोई जाती और अच्छी हो जाती, तो उसका क्रेडिट बड़े भाई को दे दिया जाता। कोई भी शुभ काम होता तो मुझे दूर बैठाया जाता। मेरे ही घर में हवन होता तो कहा जाता- ‘दूर बैठ, तू यहां बैठेगा तो अशुभ हो जाएगा।’ हां, लेकिन आधी रात में खेत में पानी देना हो तो सबको मेरी याद आ जाती थी। उसमें भी ताने मारतेकि- ‘तेरे भाई की शादी हो चुकी है। अगर उसे मोटर चलाते समय करंट लग गया, सांप ने काट लिया या ठंड लग गई तो क्या होगा? उसके बच्चों का क्या होगा? तेरा क्या है, तू तो रं@#% है।’ यह सब सुनकर मैं अंदर से टूट जाता था। किसी की शादी-ब्याह में जाने से रोका जाता था। कहा जाता कि वहां जाओगे तो लोग क्या कहेंगे? अगर कुछ गलत हो गया, तो दोष तुम्हारे सिर मढ़ दिया जाएगा। मेरे लिए कभी भी नए कपड़े तक नहीं खरीदे गए। हमेशा भाई की उतरन पहननी पड़ती थी। घरवाले कहते थे- ‘तुम्हें कौन सा ससुराल जाना है?’ घर के बच्चे तक भाव नहीं देते थे। कभी भाई के बच्चों को डांट देता तो भाभी कहती- ‘तेरी तो शादी नहीं हुई, बच्चे नहीं हुए, इसलिए तुझे मेरे बच्चे देखे नहीं जाते।’ यहां तक कि छोटे बच्चों को मेरे पास नहीं आने दिया जाता। उनके मां-बाप कहते कि उसके पास मत जाओ, गलत बातें सिखाएगा। मुझे एक तरह से कौवा बना दिया गया था। जैसे किसी शुभ काम के समय कौवे को अपशकुन माना जाता है, वैसे ही मुझे माना जाता है। हरियाणा में कुछ अविवाहित पुरुष ऐसे भी हैं, जिन्हें अपने ही घर में रहने तक की जगह नहीं दी गई। उन्हें पशुओं के बाड़े के पास रहने को मजबूर किया गया। जहां पशु बंधे होते हैं, वहीं बगल में बिस्तर लगाना पड़ता है। कहा जाता है- जाकर जानवरों के पास रहो। घर में तुम्हारे छोटे भाई की बहू है, उसे घूंघट करना पड़ेगा। वैसे भी सुबह जल्दी उठकर तुम्हें पशुओं की ही देखभाल करनी है। मैं सुबह 4 बजे उठ जाता हूं। पशुओं को चारा देता हूं, दूध निकालता हूं और उन्हें जोड़ यानी तालाब पर नहलाने ले जाता हूं। रात को फिर यही काम करता हूं। इस तरह सुबह 4 बजे उठकर रात 11 बजे जाकर सो पाता हूं। हालांकि, चाहें तो हम दलालों के जरिए पैसे देकर शादी कर सकते हैं, लेकिन कई मामलों में ठगी सामने आई है। शादी के नाम पर धोखाधड़ी का खेल चल रहा है। कई गिरोह ऐसे हैं, जो हमसे डेढ़-दो लाख रुपए लेकर शादी करवाने का दावा करते हैं। मेरे भाई की शादी भी इसी तरह करवाई गई थी, लेकिन कुछ समय बाद उसकी पत्नी जेवर और सामान लेकर भाग गई। ऐसे ही मेरे एक दोस्त ने कोर्ट मैरिज के लिए एक वकील को डेढ़ लाख रुपए दिए। डेढ़ लाख से ज्यादा के जेवर भी बनवाए। शादी हुई, लेकिन कुछ ही दिनों बाद लड़की मायके जाने का बहाना बनाकर सब लेकर चली गई। अब मेरा दोस्त कर्ज उतार रहा है। लोग उसका मजाक उड़ाते हैं- वाह, बड़ा बन रहा था लुगाई लाने वाला, क्या हुआ? आ गई लुगाई? अब गांव की चौपाल पर उसका अक्सर मजाक बनाया जाता है। जब इस तरह शादी टूटती है या दुल्हन चली जाती है, तो लोग जिस तरह मजाक बनाते है, वह अलग ही दर्द देने वाला होता है। अब तो हम सिर्फ समय काट रहे हैं। खाली पड़े रहते हैं, तो कुछ लोग खेत या बाग में घास कटाई का काम दे देते हैं। बदले में कभी पैसा तो कभी शराब दे देते हैं। इतना ही नहीं, कुछ लोग गलत काम करते भी पकड़े गए। एक बार मैं एक गांव गया था, जहां कुछ लोग एक कुंवारे मर्द को पीट रहे थे। पता चला कि वह एक कुतिया के साथ रेप कर रहा था। मैंने लोगों को समझाकर उस आदमी को बचाया और उसे भी समझाया। बाद में हमारी यूनियन ने लोगों को जागरूक किया कि इससे बचें, क्योंकि इससे संक्रमण और गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। ऐसे ही कुछ कुंवारे मर्द एक-दूसरे के साथ सेक्स करते पकड़े गए, जिससे गांवों में विवाद और तनाव बढ़ता दिखा। इसके खिलाफ भी हमने जागरूकता अभियान चलाया। हमारी यूनियन कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ भी काम कर रही है, ताकि बेटियों को बराबरी का दर्जा मिले और राज्य में यह समस्या खत्म हो। हम लोगों का सबसे बड़ा दर्द अकेलापन है। शादीशुदा आदमी अपनी हर बात पत्नी से साझा कर लेता है, लेकिन हम किससे कहें? हम रातभर घुटते हैं, और सुबह फिर वही जिंदगी शुरू हो जाती है। अब तो मन मर चुका है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही है, मुझ पर दबाव डाला जा रहा है कि मैं अपने भाई के बच्चे को गोद ले लूं, ताकि मेरी संपत्ति उसे मिल जाए। लेकिन मैंने ऐसे कई मामले देखे हैं, जहां भाई के बच्चों को जायदाद मिलते ही वे धीरे-धीरे अविवाहित लोगों को किनारे कर देते हैं। यहां तक कि उन्हें खाना तक नहीं देते और बीमारी में इलाज भी नहीं कराते। मैंने कई ऐसे लोग देखे हैं, जिन्हें ठीक देखभाल मिलती तो वे ज्यादा जी सकते थे, लेकिन कम उम्र में ही चले गए। अब जाकर मेरे गांव और आसपास के कुंवारे पुरुष जुटे और विचार किया कि इस समस्या का हल कैसे निकाला जाए। हम कब तक समाज की नजरों में चुभते रहेंगे? बातचीत के बाद हमने फैसला किया कि एक एसोसिएशन बनाई जाए- ‘समस्त अविवाहित पुरुष समाज एंड एकीकृत रं@#%यूनियन’। तय किया गया कि अब हम इसके जरिए अपने हक की आवाज उठाएंगे। हमारी यूनियन ने राज्य में प्रदर्शन कर सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाई। सरकार ने ध्यान दिया और अब हमें 3200 रुपए पेंशन मिल रही है। हालांकि, कई अविवाहित पुरुषों की फैमिली आईडी नहीं बन पाई है, इसलिए उन्हें पेंशन नहीं मिल रही। आखिर जिनका परिवारिक रिकॉर्ड ही नहीं है, वे फैमिली आईडी कहां से लाएं? हमारी यूनियन में लगभग साढ़े पांच लाख लोग हैं, जिनमें से 80 हजार को ही पेंशन मिल रही है। मेरे दोस्त सीलू सांगवान के माता-पिता नहीं हैं। इसलिए उनकी फैमिली आईडी नहीं बन पाई, जिससे उन्हें पेंशन का लाभ नहीं मिल रहा। आखिर में सरकार से बस एक ही मांग है- हमें शक की नजर से न देखा जाए। हम भी इंसान हैं। हमें सम्मान के साथ जीने का हक मिले। (वीरेंद्र दून ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए) ———————————- 1- संडे जज्बात-मैंने 20 अपनों को गोली मारी:अपनों पर गोली चलाना आसान नहीं था, लेकिन बम-धमाके में साथियों की मौत ने मुझे झकझोर दिया था मैं शरतचंद्र बुरुदा हूं, ओडिशा के मलकानगिरी जिले के सरपल्ली गांव का रहने वाला। एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी हूं। 1990 के दशक के आखिर में जब मैंने पुलिस की नौकरी जॉइन की, तब ओडिशा के दंडकारण्य इलाके में नक्सलवाद अपने चरम पर था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-उन्होंने हेलिकॉप्टर से लाश भेजी, हम ट्रेनें भर देंगे:दिल्ली वालों ने पीट-पीटकर मार डाला मेरा बेटा, क्योंकि हमारी शक्ल अलग है मैं अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर की रहने वाली मरीना नीडो हूं- नीडो तानिया की मां, जिसे दिल्ली में भीड़ ने पीट-पीटकर मार दिया। अगर ऐसी नफरत बढ़ती रही, तो किसी दिन हालात खतरनाक हो सकते हैं। हम बस इतना चाहते हैं कि- आप हमें समझिए। हम अलग दिखते हैं, लेकिन अलग नहीं हैं। हम भी इसी देश के हैं। मेरे बेटे को सिर्फ इसलिए मार दिया गया, क्योंकि उसका चेहरा आपसे अलग था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें



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