पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों—रेजीनगर और नंदीग्राम—पर छह अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव से ठीक पहले सियासी घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं। शनिवार को रेजीनगर से तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अधिकृत उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी ने सुबह दस बजे अचानक चुनाव मैदान से हटने की घोषणा कर दी, लेकिन लगभग तीन घंटे बाद ही दोपहर एक बजे उन्होंने अपना फैसला पलटते हुए कहा कि वे चुनाव लड़ेंगे। इस यूटर्न के पीछे पार्टी का पुराना चुनाव चिह्न ‘जोड़ा घासफूल’ न मिलना और नया चिह्न ‘फुटबॉल प्लेयर’ आवंटित होना बताया गया। रबीउल ने सुबह मीडिया से कहा था, “पार्टी का मूल चिह्न नहीं मिलने से मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा।” हालांकि, बाद में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से टेलीफोन पर बातचीत के बाद उन्होंने स्पष्ट किया, “मैं चुनाव लड़ूंगा।” इस घटनाक्रम से एक दिन पहले नंदीग्राम में ममता गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने अपना नामांकन वापस ले लिया था, जिससे वहां भी अनिश्चितता पैदा हो गई।
चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को TMC के दोनों गुटों को मूल नाम ‘तृणमूल कांग्रेस’ और चिह्न ‘जोड़ा घासफूल’ इस्तेमाल करने से रोक दिया था। इसके बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल प्लेयर’ चिह्न आवंटित किया गया, जबकि बागी नेता अरूप रॉय के गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चिह्न मिला। ममता बनर्जी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। शुक्रवार को दायर याचिका में उन्होंने चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी को पक्षकार बनाया है।
TMC में विभाजन की जड़ें मई के विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद गहरी हुईं। जून में 58 बागी विधायकों ने ममता खेमे के उम्मीदवार शोभनदेव चट्टोपाध्याय की जगह निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता चुन लिया, जिसे स्पीकर ने मान्यता भी दे दी। पार्टी के 28 साल के इतिहास में यह पहली बड़ी टूट थी। विवाद संसद तक पहुंचा जब 20 लोकसभा सांसदों ने काकली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में अलग समूह बनाकर भाजपा नीत NDA को समर्थन देने की घोषणा की। दोनों गुटों ने मूल नाम और चिह्न पर दावा ठोका, जिसके बाद चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश जारी कर दोनों को नए नाम-चिह्न के साथ मैदान में उतरने को कहा।
नंदीग्राम सीट का राजनीतिक महत्व जगजाहिर है। 2007 के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने ममता बनर्जी और TMC को 2011 में सत्ता तक पहुंचाया। 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता ने इसी सीट से तत्कालीन सहयोगी शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन हार गईं। अधिकारी बाद में भाजपा में शामिल होकर TMC के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी बन गए। 2026 के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम के साथ भवानीपुर सीट से भी चुनाव लड़ा और दोनों जगह जीत दर्ज की। भवानीपुर में उन्होंने ममता बनर्जी को 15,105 मतों से हराया—अधिकारी को 73,917 वोट मिले जबकि ममता को 58,812। बाद में अधिकारी ने भवानीपुर सीट अपने पास रखी और नंदीग्राम से इस्तीफा दे दिया, जिससे यह सीट रिक्त हुई। रेजीनगर सीट TMC विधायक हुमायूं कबीर के इस्तीफे के बाद खाली हुई है।
उधर, नंदीग्राम से कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को 2007 के नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के दौरान हुए एक पुराने हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक, इस मामले में उनके खिलाफ पहले से वारंट जारी था। फिलहाल अदालत ने उन्हें तीन अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया है।
उम्मीदवारों के नाम वापसी और गिरफ्तारी से जुड़े प्रक्रियात्मक पहलुओं पर चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों के आधार पर आठ सवाल-जवाब इस प्रकार हैं:
1. नाम वापसी के बाद अगला कदम क्या होगा? — नाम वापसी की आधिकारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद रिटर्निंग ऑफिसर अंतिम उम्मीदवारों की सूची जारी करेंगे और शेष उम्मीदवारों के बीच तय कार्यक्रम के अनुसार चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
2. क्या नाम वापस लेने वाला उम्मीदवार फैसला बदल सकता है? — नहीं। एक बार वैध तरीके से नाम वापसी हो जाने के बाद उसी चुनाव में उम्मीदवारी दोबारा बहाल नहीं की जा सकती।
3. अगर नाम वापसी के बाद सिर्फ एक उम्मीदवार बचे तो? — ऐसी स्थिति में चुनाव निर्विरोध हो सकता है। रिटर्निंग ऑफिसर प्रक्रिया पूरी कर उस उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित कर सकता है।
4. नाम वापसी की समय-सीमा खत्म होने के बाद नया उम्मीदवार खड़ा किया जा सकता है? — नहीं। समय-सीमा समाप्त होने के बाद उसी चुनाव में नया नामांकन दाखिल करने का मौका नहीं मिलता।
5. क्या गिरफ्तारी से उम्मीदवारी खत्म हो जाती है? — सिर्फ गिरफ्तारी से उम्मीदवारी स्वतः खत्म नहीं होती। संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत अयोग्यता की स्थिति बनना जरूरी है।
6. गिरफ्तार उम्मीदवार चुनाव लड़ सकता है? — अगर उम्मीदवार कानूनी रूप से चुनाव लड़ने के लिए योग्य है और उसकी उम्मीदवारी वैध है, तो केवल गिरफ्तारी के आधार पर उसका नाम बैलेट से हटाना आवश्यक नहीं होता।
7. जेल में बंद उम्मीदवार प्रचार कैसे करेगा? — वह खुद प्रचार, जनसभा या मतदाताओं से सीधे संपर्क में शामिल नहीं हो पाएगा, हालांकि उसकी उम्मीदवारी अलग से बनी रह सकती है।
8. अगर उम्मीदवार को बाद में अदालत से राहत मिलती है तो? — इसका असर मामले की कानूनी स्थिति और अदालत के आदेश पर निर्भर करेगा। चुनावी प्रक्रिया में उम्मीदवार की पात्रता संबंधित कानूनी प्रावधानों के आधार पर तय होगी।
उपचुनाव की मतगणना नौ अक्टूबर को होगी। दोनों सीटों पर TMC के दोनों गुटों, भाजपा, कांग्रेस और वाम मोर्चे के उम्मीदवारों के बीच मुकाबला तय माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नाम-चिह्न विवाद और उम्मीदवारों के पलटवार से मतदाताओं में भ्रम की स्थिति बन सकती है, जिसका असर मतदान प्रतिशत और नतीजों पर पड़ना तय है।


















